मोकामा कभी बिहार की हृदय स्थली था। कभी भौगोलिक स्थिति में बिहार के मध्य में गंगा नदी के किनारे बसा यह शहर अन्तरदेशीय नौवाहन का प्रमुख केन्द्र था। जब गंगा नदी के आर-पार अंग्रेजी राज में रेलवे लाइन बना तो यह शहर अन्तरदेशीय शिपमेंट बन गया और 1893 में विश्व प्रसिद्ध शिकारी, प्रकृति प्रेमी और लेखक जिम कार्बेट ने बरसों यहां ट्रांस शिपमेंट इंस्पेक्टर के रूप में नौकरी की थी। मोकामा से सिमरिया घाट के बीच रेलवे के सामानों के अदला-बदली का केन्द्र भी।
इस तरह पकड़ी थी विकास की राह
आजादी बाद यहां मानवता की सेवा के लिए नजारथ या पादरी अस्पताल खुला। जहां दूर-दूर से लोग इलाज के लिए आते थे। मैकडोवल्स की फैक्ट्री खुली तो भारत वैगन का कारखाना भी लगा। यहां इंडियन टेक्सटाइल्स कारपोरेशन के उपक्रम थे तो बाटा कंपनी की मशहूर फैक्ट्री भी लगी। सीआरपीएफ बटालियन का हेडक्वार्टर भी बना और गंगा नदी पर सिमरिया-मोकामा के बीच बिहार का पहला पुल बनने के बाद इसकी गरिमा में चार चांद लग गए। मोकामा के दक्षिण टाल का पानी भरा क्षेत्र दाल उत्पादन का कटोरा बन गया और लाखों टन दाल उत्पादन का बड़ा क्षेत्र भी।
फिर बनता गया राजनीति के बाहुबल का केंद्र
एकतरफ मोकामा भौगोलिक व्यापारिक आर्थिक स्थिति का केन्द्र बना तो राजनीति के बाहुबल का केंद्र भी बनता गया। रंगदारी, अपहरण और लूट-डकैती के मामले चर्चा में आने के साथ ही उद्योग का बंटाधार, व्यापारियों का पलायन और रंगदार का प्रकोप शुरू हो गया। एक-एक कर कारखाना सिमटे, बंद हुए और फिर अपराध व बाहुबल के आगोश में समाते गया शहर। 1990- 95 आते-आते मोकामा की गलियां रंगदारों से पट गया और पिस्टल-राइफल से लेकर अत्याधुनिक हथियारों को रखने वाले बाहुबली ने बड़हिया से बेगूसराय तक और हथिदह से पटना तक अपना एक साम्राज्य बनाना शुरू कर दिया।
राजनीति भी अछूती नहीं रही
1980 में युवा कांग्रेस के नेता श्यामसुंदर सिंह धीरज के यहां से विधायक बनने के साथ स्थानीय रंगदारों को प्रोत्साहन मिला और कांग्रेस की राजनीति में उनकी धाक बनने से यह लगातार जारी रहा। दिलीप सिंह, नाटा सिंह, सूरज सिंह, दुलारचंद यादव, रामजी ढांढी, अनंत सिंह आदि पनपते गए और मोकामा की हवा जहां कभी नजारथ अस्पताल तो कभी मैकडोवेल की गंध थी वह बारूदी दहशतगर्दी और रंगदारी के गंध में बदल गया। 1985 में यहां से कांग्रेस के श्यामसुंदर सिंह धीरज ने पुनः सफलता पाई। लेकिन,1990 के चुनाव में कभी उनके ही शागिर्द रहे दिलीप सिंह ने जनता दल के प्रत्याशी के रूप में जीत हासिल कर उन्हें मोकामा के नेपथ्य में धकेल दिया। कहा जाता है कि 1989 में जनता दल से बाढ़ से सांसद बने नीतीश कुमार की चुनाव में मददगार बनने की वजह से बाहुबली दिलीप सिंह को 1990 के विधानसभा चुनाव में जनता दल का टिकट दिलाने में सहायक बने। दिलीप सिंह 1990 और 1995 में लगातार विधायक बने और तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव के विश्वासपात्र बन गए। उन्हें मंत्री भी बनाया गया।
सूरजभान ने 2000 में ‘बड़े सरकार’ को हराया था
मोकामा के बारूदी गंध में 2000 में कुख्यात सूरजभान सिंह ने दिलीप सिंह को परास्त कर इस सीट पर कब्जा कर लिया। वर्ष 2004 में सूरजभान रामविलास पासवान की पार्टी लोजपा से सांसद बन गए और मोकामा की यह सीट दिलीप सिंह के भाई अनंत सिंह के कब्जे में आ गई। तबसे 2025 तक यह सीट अनंत सिंह के कब्जे में है। वर्ष 2022 में इनके सजायाफ्ता घोषित होने के बाद पत्नी नीलम देवी यहां से विधायक चुनीं गई। लगातार पांच चुनाव जीतने की वजह से मोकामा में इन्हें छोटे सरकार की संज्ञा दी जाती है। ये अपने अलग अंदाज, मीडिया में अपने अनोखे बयानों और करतूतों की वजह से चर्चित रहे हैं। कभी नीतीश तो कभी लालू की पार्टी राजद से विधायक बने अनंत सिंह पिछले दो दिनों से तारतर में कभी टाल क्षेत्र का आतंक रहे दुलारचंद यादव की हत्या और टकराव को लेकर चर्चा में हैं।
अनंत सिंह और सूरजभान के बीच मूंछ की लड़ाई
मोकामा में इस बार के चुनाव में NDA से जदयू के अनंत कुमार सिंह उम्मीदवार हैं तो महागठबंधन से राजद ने पूर्व सांसद और सूरजभान सिंह की पत्नी वीणा देवी को उतारा है। दो बाहुबलियों की टक्कर में दुलारचंद यादव की मौत से मोकामा का चुनाव तनावपूर्ण और दहशत का बनता जा रहा है। बिहार के जातीय राजनीति के दो धूरी नीतीश कुमार और लालू यादव के दो पोसुआ बाहुबली मोकामा में दो ध्रुव बने हैं। राजनीति के इस तोपखाना पर बैठे मोकामा के राजनीतिक वातावरण में शांति लौटेगी, पुरानी रौनक लोटेगी या फिर यह रंगदारी और बाहुबली के आगोश में कैद रहेगी यह तो चुनाव परिणाम ही बताएगा।
अनंत सिंह का आपाराधिक इतिहास
अनंत सिंह को 2015 में अनंत सिंह को अपहरण और हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। 2019 में छापेमारी में एके-47 राइफल, ग्रेनेड और कारतूस बरामद हुए। अनंत सिंह ने 2020 के चुनाव में अपने हलफनामे में 38 मामलों का जिक्र किया है। हालांकि आधिकारिक रिकॉर्ड में 1979 से अब तक 50 से ज्यादा मामले दर्ज हैं।
सूरजभान के खिलाफ 26 मामले दर्ज
सूरजभान के खिलाफ 26 आपराधिक मामले दर्ज हैं। इनमें 1992 में हुई एक हत्या और 1998 में पूर्व मंत्री बृजबिहारी प्रसाद की हत्या जैसे चर्चित हत्याकांडों में वे अभियुक्त हैं, जिसमें उन्हें 2014 में पटना उच्च न्यायालय और 2024 में सर्वोच्च न्यायालय से बरी कर दिया गया था। अपराध से जुड़े इन मामलों के कारण सूरजभान के चुनाव लड़ने पर रोक लगी हुई है और इसी वजह से सूरजभान ने अपनी पत्नी वीणा देवी को अनंत सिंह के खिलाफ चुनाव मैदान में खड़ा किया है।











