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मृत्यु भोज : दिखावे की परंपरा और सामाजिक विवेक की कसौटी

सनातन परंपरा में मृत्योपरांत 13 दिनों तक कर्मकांड, श्राद्ध और पिंडदान का विधान है, किंतु मृत्यु भोज के नाम पर पैसे का प्रदर्शन सामाजिक विकृति को उजागर करता है।

बेगूसराय के एक सफल व्यवसायी का लंबे इलाज के बाद निधन हो गया। ईश्वर दिवंगत आत्मा को शांति प्रदान करे। वे एक सफल व्यवसायी थे। कारोबार देश के कई राज्यों में फैला है। ऐसे ही लोगों के परिवार से अपेक्षा होती है कि वे नई लकीर बनाएं। अब तक नई लकीर बनाते भी आए हैं। लेकिन मृत्यु भोज के नाम पर हो रहे आडंबर ने फिर से इसे चर्चा का विषय बना दिया है।

शोक की घड़ी में पैसे का प्रदर्शन
सनातन परंपरा में मृत्यु के उपरांत 13 दिनों तक पूजा-पाठ, कर्मकांड, श्राद्ध और पिंडदान का विधान है, किंतु 3-5 दिनों तक चलने वाले महाभोज का कहीं उल्लेख नहीं मिलता। आज शोक की घड़ी में जिस तरह से पैसे का प्रदर्शन किया जा रहा है, वह सामाजिक विकृति को उजागर करता है। पूरे भारत से लोगों को बुलाकर भव्य भोज का आयोजन किया जा रहा है। न तो धर्म, न ही हमारी परंपराएं इस तरह के आयोजन की अपेक्षा करती हैं।


जरा, सोचिए… दिखावे की कीमत कौन चुका रहे?
इस दिखावे की सबसे बड़ी कीमत चुकाते हैं आर्थिक रूप से कमजोर लोग। जब समाज के संपन्न लोग मृत्यु भोज को प्रतिष्ठा का विषय बना देते हैं तो गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों पर भी वही दबाव आता है। मजबूरी में वे खेत बेचते हैं, कर्ज लेते हैं, गहने गिरवी रखते हैं- सिर्फ इसलिए कि समाज ताने न मारे, बिरादरी से अलग न कर दे। कुछ लोग मजबूरी में ऐसा करते हैं तो कुछ इस होड़ में कि “जब फलां बाबू इतना कर सकते हैं, तो हम उनसे कम क्यों रहें?” और इसी दुष्चक्र में समाज पिसता चला जाता है।

यह आत्ममंथन का समय
अब समय आ गया है कि हम आत्ममंथन करें। शोक को प्रदर्शन का माध्यम न बनाएं। मृत्यु भोज जैसी कुप्रथाओं को समाप्त कर, संवेदना, सादगी और सामाजिक जिम्मेदारी को अपनाएं। तभी हम सच अर्थों में एक संवेदनशील, न्यायपूर्ण और प्रगतिशील समाज की ओर बढ़ सकेंगे।

राजस्थान : 1960 से ही मृत्युभोज पर पाबंदी
1960 में राजस्थान मृत्युभोज निवारण अधिनियम पारित किया गया था। कानून की धारा-3 के तहत कोई भी व्यक्ति राज्य में मृत्युभोज का आयोजन नहीं करेगा और न ही उसमें शामिल होगा और न ही इसके लिए किसी पर दवाब डालेगा। दोषी पाए जाने पर एक साल का कारावास और 1000 रुपए के जुर्माने का प्रावधान है।

जिले के लिए नजीर है मोहनपुर गांव
अगर बेगूसराय जिले की बात करें तो मोहनपुर गांव ने मृत्यु भोज के नाम पर होने वाले आडंबर को सीमित कर एक मिसाल कायम किया है। यहां के निवासी राजकिशोर रंजन ने वर्ष 2019 में मां की मृत्यु के उपरांत भोज को सीमित किया। वृहत भोज पर खर्च होने वाले करीब 10 लाख रुपए रामनंदन सिंह उच्च विद्यालय, मोहनपुर को दिए। ग्रामीणों ने उनके इस प्रयास को खूब सराहा। उनके बेटे और बहू ने भी मध्य विद्यालय, मोहनपुर को उन्नत बनाने के लिए लाखों रुपए दिए हैं। इस पहल का परिणाम यह रहा कि कई ग्रामीणों ने मृत्युभोज काे सीमित कर विद्यालय की बेहतरी के लिए रुपए दान दिए। हाई स्कूल के लिए जमीनदाता रामनंदन सिंह की पत्नी के निधन के बाद बेटी और दामाद ने भी भोज कम कर 10 लाख रुपए से हाई स्कूल में दो वर्ग कक्ष का निर्माण कराया। वहीं रेलवे से सेवानिवृत्त एजीएम (स्व.) इंद्रदेव प्रसाद सिंह ने भी परिजन के निधन पर भोज नहीं कर हाई स्कूल की दशा सुधारने के लिए वर्ग कक्ष का निर्माण कराया।

Picture of हिमांशु शेखर

हिमांशु शेखर

17 वर्षों से पत्रकारिता का सफर जारी। प्रिंट मीडिया में दैनिक भास्कर (लुधियाना), अमर उजाला (जम्मू-कश्मीर), राजस्थान पत्रिका (जयपुर), दैनिक जागरण (पानीपत-हिसार) और दैनिक भास्कर (पटना) में डिप्टी न्यूज एडिटर के रूप में कार्य करने के बाद पिछले एक साल से newsvistabih.com के साथ डिजिटल पत्रकारिता।
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दीपक मिश्रा
दीपक मिश्रा
2 days ago

दिखावा कही हो बंद होना होना चाहिए, अंबानी की शादी में वो अपना जमा का एक या दो प्रतिशत खर्च किए , लेकिन उसकी नकल में लोग अपनी जमा पूंजी लगा कर्ज में डूब जाते हे,
क्योजी मध्यम वर्गी लोगो की आदत होती हे अपने को अमीर दिखाने की,
वहीं हाल मृत्यु भोज का है, कोई अपनी संपत्ति को कुछ छोटा सा हिस्सा खर्च कर के बड़ा आयोजन करता हे, परंतु आम मध्यमवर्गीय लोग दवाब में खर्च कर कर्ज में डूब अपना भविष्य खराब करते हे।
बेहतर होगा कि लोग सादगी का प्रदर्शन कर बचे धन को जनकल्याण में लगा आदर्श प्रस्तुत कर लोगो को प्रेरणा देते।

Ranjan Kumar
Ranjan Kumar
2 days ago

हम एक मनुष्य के तौर पर समाज की मौलिक इकाई होते हैं । समूह में रहने के अपने नैसर्गिक गुणों के कारण एक समाज की रचना करते हैं । समाज को गढ़ने, विकसित करने और उसे सुंदर बनाने में सब अपनी क्षमता के अनुसार योगदान देते हैं तथा इसी योगदान की व्यापकता के सापेक्ष किसी व्यक्ति के निधन पर हम अपनी शोक संवेदनाएं व्यक्त करते हैं । आज भी हम काफी वर्ष पूर्व गुजर चुके मनीषियों के योगदान को याद करते हैं, श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं ।
शोक संतप्त परिवार को संबल देना, निधन हुए व्यक्ति के कृतित्व की स्मृतियों को प्रेरक बनाना अच्छी बात है लेकिन भव्य भोज जैसे आयोजन को नियंत्रित भी करने की जरूरत है। श्रम व उद्यम के विभिन्न तरीकों से (इस श्रम और उद्यम का स्वरूप जो भी हो) अर्जित निधि की अधिकतम उपयोगिता सुनिश्चित हो इसके लिए हर संभव उपाय किया जाना चाहिए । शादी और श्राद्ध के बृहत भोज से धन बचाकर विद्यालय और पुस्तकालय तैयार करने की गौरवशाली परंपरा खड़े करने वाले हमारे समाज में अब विद्यालयों के प्रति शून्य पड़ती संवेदनाएं चिंताजनक हैं, इस प्रसंग में मोहनपुर से राजकिशोर बाबू का उदाहरण प्रणम्य है। इसी तरह रामदीरी में भी मध्य विद्यालय और उच्च विद्यालय को एक नेशनल आइकन बनाया जा सकता है।

दुनिया में अल्फ्रेड नोबेल की स्मृतियां, प्रति वर्ष प्रदत्त शीर्ष अवार्ड के तौर पर आज भी बारम्बार पुनरावृत्त हो रही हैं । भारत में भी कुछ उद्यमियों के नाम पर कई उत्कृष्ट अवॉर्ड चलाए जा रहे हैं । इसमें प्रक्रिया संचालित करनेवाली टीम को मिलनेवाले रोजगार से लेकर अवार्ड विजेता के माध्यम से समाज में एक प्रेरक परिचर्चा और उसकी बनती एक श्रृंखला अर्जित धन के उत्कृष्ट सामाजिक उपयोग का उदाहरण है । बेगूसराय के कुछ स्थापित और कुछ नवोदित उद्यमियों ने उत्कर्ष फाउंडेशन के नाम से ट्रस्ट बनाकर जिले के जरूरत मंद मेधावी 20छात्रों को 5000 रुपए की छात्रवृत्ति देना भी एक शानदार उदाहरण है ।
वर्तमान प्रसंग में उठ रहे सवाल विचारों को उद्दीप्त करनेवाले तथा ऐसे निर्णयों पर पुनर्विचार को प्रेरित करनेवाले हैं । इस विमर्श को काफी सकारात्मक रूप से निर्णय लेने की दिशा में आगे बढ़ाने की जरूरत है ।

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