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जमींदारी व्यवस्था के खिलाफ ही हुआ था संन्यासी विद्रोह, पूर्णिया बना था केंद्र : अवनीन्द्र झा

जमींदारों के नीचे जमींदार पनपने से राजस्व में वृद्धि हुई। इसी जमींदारी प्रथा के विरोध में संन्यासी विद्रोह हुआ था। इस विद्रोह का केंद्र पूर्णिया बना था।
  • दरभंगा में राज्य, जमींदार आओर रैयत : अंत: संबंधक विवेचना विषय पर व्याख्यानमाला आयोजित
  • पोथीघर फाउंडेशन और महारानी अधिरानी रमेश्वरलता संस्कृत कॉलेज के संयुक्त तत्वावधान में कार्यक्रम आयोजित

दरभंगा | ‘18वीं शताब्दी में ईस्ट इंडिया कंपनी को दीवानी प्राप्त हो गई। कंपनी ने जो पहला कार्य किया वह था जमींदारों की उत्पत्ति। राजस्व प्राप्त करने वाला ‘राज्य’, वसूली एवं प्रबंधन करने वाला ‘जमींदार’ और भुगतान करने वाले ‘रैयत’ हुए। जमींदारों को अधिकार सौंपते समय राज्य से एक गड़बड़ी यह हुई कि जो अधिकार उन्हें नहीं देनी चाहिए थी, वह भी उनको दे दिया। परिणामस्वरूप जमींदारों के नीचे भी जमींदार पनपते चले गए। इससे राजस्व में वृद्धि स्वाभाविक थी। परिणामस्वरूप संन्यासी विद्रोह हुआ, जिसका केंद्र पूर्णिया था। इस तरह जमींदारों को जमीन संबंधी दस्तावेजों का अधिकार देना, सबसे बड़ी भूल साबित हुई। ये बातें रविवार को वरिष्ठ इतिहासकार डॉ. अवनीन्द्र कुमार झा ने ‘राज्य, जमींदार आओर रैयत: अंतःसम्बन्धक विवेचना’ विषय पर आयोजित व्याख्यानमाला में कहीं। व्याख्यानमाला का आयोजन महारानी अधिरानी रमेश्वरलता संस्कृत महाविद्यालय, दरभंगा के सभागार में पोथीघर फाउण्डेशन और महाविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में किया गया।

व्याख्यानमाला को संबोधित करते डॉ. अवनीन्द्र कुमार झा।

जमींदारों ने रैयतों के हित में भी काम किए
व्याख्यान को संबोधित करते हुए डॉ. झा ने मिथिला के राज्य, राजस्व, ग्रामीण व्यवस्था आदि को रेखांकित करते हुए कहा कि ऐसा नहीं है कि जमींदारों ने रैयतों के हित में कार्य नहीं किए। पहली बार राज दरभंगा द्वारा सिंचाई व्यवस्था हवेली खड़गपुर में आरंभ की गई। अभी सरकार के पास कैडस्टल सर्वे ही सबसे महत्वपूर्ण मानक है।

राज्य, जमींदार और रैयत के बीच सामंजस्य जरूरी
कार्यक्रम की अध्यक्षता महारानी अधिरानी रमेश्वरलता संस्कृत महाविद्यालय के प्राचार्य डाॅ. दिनेश झा ने की। अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉ. झा ने कहा कि सामाजिक संतुलन के लिए राज्य, जमींदार और रैयत के बीच सामंजस्य बहुत जरूरी है। इस तरह के समाजोपयोगी कार्यक्रम होते रहने चािहए। पोथीघर फाउण्डेशन का यह कदम अनुकरणीय है।

व्याख्यानमाला में मौजूद प्रोफेसर, शोधार्थी और छात्र-छात्राएं।

अगली व्याख्यानमाला ‘मिथिलाक पुरातत्व आ मृण मूर्ति काल निर्धारण’ विषय पर
पोथीघर फाउण्डेशन के सचिव आनंद मोहन झा बताया कि अगले महीने आयोजित होने वाली व्याख्यानमाला का विषय ‘मिथिलाक पुरातत्व आ मृण मूर्ति काल निर्धारण’ है। चन्द्रधारी संग्रहालय, दरभंगा के संग्रहालयाध्यक्ष डॉ. शंकर सुमन इसके वक्ता होंगे। इस अवसर पर पोथीघर फाउण्डेशन का नारा ‘लाउ व्यवहार में, पोथी उपहार में’ के तहत पोथीघर फाउण्डेशन की अध्यक्षा गुड़िया झा की ओर से अतिथियों को उपहार में पोथी प्रदान किया गया। मौके पर डाॅ. शंकर देव झा, मोदनाथ मिश्र, डाॅ. पवन कुमार झा, डाॅ. राम सेवक झा, डाॅ. मैथिली कुमारी, सहित कई प्रोफेसर, शोधार्थी मौजूद थे। कार्यक्रम का संचालन आशुतोष मिश्र और धन्यवाद ज्ञापन आनंद मोहन झा ने किया।

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Shekhar

पत्रकारिता ही की है अब तक।
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