- बिहार के चर्चित लोकगायक बलराम कुंवर की 100वीं जयंती मनाई गई
बेगूसराय। दिनकर पुस्तकालय सिमरिया के प्रांगण में शुक्रवार को बादल भवन में बिहार के चर्चित लोकगायक बलराम कुंवर की 100वीं जयंती मनाई गई। इस अवसर पर डिजिटल युग में लोक कला की चुनौतियां व संभावनाएं विषयक विचार गोष्ठी की अध्यक्षता दिनकर पुस्तकालय के वरिष्ठ सदस्य पूर्व प्रधानाचार्य विजय कुमार चौधरी एवं संचालन वरिष्ठ पत्रकार प्रवीण प्रियदर्शी ने किया। धन्यवाद ज्ञापन पुस्तकालय के सचिव संजीव फिरोज ने किया। अतिथियों का स्वागत दिनकर पुस्तकालय के अध्यक्ष विश्वंभर सिंह ने किया। विचार गोष्ठी को संबोधित करते हुए वरिष्ठ रंगकर्मी अनिल पतंग ने कहा कि बलराम कुंवर हमसबों के पुरोधा हैं। लोक कला के लिए वे आजीवन कार्य करते रहे। आज लोक कला संकट में है।
लोककला से नई पीढ़ी विमुख हो रही है : डॉ अमित रौशन
आशीर्वाद रंगमंडल के सचिव डॉ अमित रौशन ने कहा कि आज लोककला से नई पीढ़ी विमुख हो रही है। आज संयुक्त परिवार टूट कर एकल परिवार में बिखर गया है। उन्होंने कहा कि डिजिटल युग में नई संभावनाओं को तलाशने की जरूरत है। प्रत्यक्ष गवाह पत्रिका के संपादक पुष्कर प्रसाद सिंह ने बलराम कुंवर के मशहूर गीत मोरे सूनी रे मरइया से डर लागे को तरन्नुम में गाया जिसे सुनकर श्रोता भावविभोर हो गए।

नई पीढ़ी को लोक कलाकारों से जोड़ने की जरूरत : परवेज युसूफ
मॉडर्न थियेटर फाउंडेशन बेगूसराय के निदेशक परवेज यूसूफ ने कहा कि नई पीढ़ी को लोक कलाकारों से जोड़ने की जरूरत है। लोककला के संवर्द्धन में डिजिटल संसाधनों का अधिक से अधिक उपयोग करना चाहिए। इसे अवसर के रूप में देखने की जरूरत है। गोष्ठी को इंजीनियर कन्हाई पंडित समेत कई अन्य कला मर्मज्ञों ने संबोधित किया। कार्यक्रम के प्रारंभ में दिनकर प्लस टू स्कूल की छात्राओं ने संगीत शिक्षक सुनील कुमार के नेतृत्व में बलराम कुंवर के गीतों को प्रस्तुत किया। आगत अतिथियों को अंगवस्त्र एवं मोमेंटो प्रदान कर सम्मानित किया गया।
मौके पर ये लोग थे मौजूद
मौके पर राजेन्द्र राय, गीता राय, मुखिया प्रतिनिधि गोपाल कुमार, कृष्ण मुरारी, मनीष कुमार, दिनकर स्मृति विकास समिति के सचिव प्रदीप कुमार, सरोज कुमार, विजय कुमार, अशोक पासवान, सुनील कुमार सिंह, विष्णुदेव राय, केदारनाथ भास्कर, प्रियव्रत कुमार, राधे कुमार समेत कई गणमान्य ग्रामीण मौजूद थे।








