
बिहार में 211 नए डिग्री कालेज और 60 हजार से अधिक नामांकन। आंकड़े शानदार हैं। नीयत भी जनहितकारी नजर आती है। यह केवल कालेजों की संख्या बढ़ाने का निर्णय नहीं है, बल्कि उच्च शिक्षा को गांव और प्रखंड तक पहुंचाने का प्रयास भी है। जिन प्रखंडों में आज तक सरकारी डिग्री कालेज नहीं था, वहां अब स्नातक शिक्षा का रास्ता खुला है। हजारों परिवारों का आर्थिक बोझ कम होगा। छात्राओं की पढ़ाई बीच में छूटने की आशंका घटेगी। उच्च शिक्षा का दायरा बढ़ेगा। इस ऐतिहासिक फैसले के लिए सरकार की पीठ थपथपाई जानी चाहिए। लेकिन, तालियों की गूंज शांत होने के बाद जब जमीनी हकीकत देखते हैं तो यह पूरी योजना शिक्षा कम और ‘जुगाड़ का तदर्थवाद’ ज्यादा नजर आती है।
आज इन कालेजों में 60 हजार से अधिक छात्र नामांकित हो चुके हैं। यह बताता है कि ऐसे संस्थानों की जरूरत लंबे समय से थी। सरकार ने उस मांग को पहचानकर अवसर उपलब्ध कराया है। फिर भी एक सवाल अनिवार्य है। क्या व्यवस्था भी उतनी ही तैयार थी, जितनी घोषणा?
फिलहाल इन 211 कालेजों में कक्षाएं शुरू हो गई हैं, लेकिन इन कालेजों में अधिकांश या यूं कहें कि किसी के पास अपना भवन नहीं है। तो फिर सवाल है कि आखिर ये कालेज चल कहां रहे हैं? अधिकांश का संचालन प्लस-टू और बुनियादी विद्यालयों के भवनों में होगा। आदर्श व्यवस्था कहती है—पहले भवन बने, फिर शिक्षक आएं और अंत में कक्षाएं शुरू हों। बिहार में उल्टा है। सरकार का तर्क है कि यह अस्थायी व्यवस्था है। स्थायी भवन बनने तक पढ़ाई रुके नहीं। सोच सही है, लेकिन व्यवहारिक कठिनाइयों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। बिहार के कई सरकारी विद्यालय पहले से कमरों की कमी झेल रहे हैं। कई स्थानों पर पर्याप्त फर्नीचर नहीं है। कहीं प्रयोगशालाएं अधूरी हैं तो कहीं पुस्तकालय केवल औपचारिकता बनकर रह गए हैं। कई अपग्रेडेड हाई स्कूल आज भी अपने पूर्ण भवन की प्रतीक्षा कर रहे हैं। ऐसी स्थिति में उन्हीं परिसरों में स्नातक स्तर की कक्षाएं चलाना आसान नहीं होगा। इसका असर केवल कालेजों पर नहीं पड़ेगा। स्कूल शिक्षा भी प्रभावित हो सकती है। एक ही परिसर में दो अलग-अलग शैक्षणिक व्यवस्थाओं को संचालित करना प्रशासनिक चुनौती भी है और शैक्षणिक चुनौती भी। किसी भी शैक्षणिक निर्णय की सफलता उद्घाटन से नहीं, संचालन से तय होती है। यहीं से असली परीक्षा शुरू होती है।
उच्च शिक्षा का अर्थ केवल कक्षा लेना नहीं है। उसके लिए अलग शैक्षणिक वातावरण चाहिए। संवाद और शोध का माहौल चाहिए। यदि कालेज लंबे समय तक स्कूल भवनों तक सीमित रहेंगे, तो विद्यार्थियों को वह वातावरण नहीं मिल पाएगा, जिसकी अपेक्षा एक डिग्री कालेज से की जाती है।
शिक्षकों की स्थिति भी कम चुनौतीपूर्ण नहीं है। सरकार ने 3,687 संविदा आधारित सहायक प्राध्यापकों की नियुक्ति प्रक्रिया शुरू की है। यह आवश्यक कदम है। तय समय-सीमा भी बनाई गई है। यदि नियुक्तियां समय पर पूरी हो जाती हैं, तो नए कालेजों को शैक्षणिक आधार मिलेगा, लेकिन तब तक व्यवस्था चलाने के लिए पुराने कालेजों से शिक्षकों और प्राचार्यों की प्रतिनियुक्ति की गई है। इस निर्णय का उद्देश्य स्पष्ट है। नए कालेजों में पहले दिन से पढ़ाई शुरू हो। विद्यार्थियों का सत्र प्रभावित न हो। यह उद्देश्य उचित है, लेकिन इसका दूसरा पक्ष भी है। बिहार के अधिकांश विश्वविद्यालय पहले से शिक्षकों की कमी से जूझ रहे हैं। अनेक विभाग वर्षों से रिक्त पदों के सहारे चल रहे हैं। ऐसे में पुराने कालेजों से शिक्षकों को हटाकर नए कालेजों में भेजना स्थापित संस्थानों पर अतिरिक्त दबाव डालता है। जो कालेज पहले ही सीमित संसाधनों में चल रहे थे, वहां अब कक्षाओं के प्रभावित होने का खतरा बढ़ गया है। कुछ विषयों में नियमित पढ़ाई बाधित हो सकती है। विद्यार्थियों को समय पर शिक्षक नहीं मिल पाएंगे। इसका असर परिणामों और शैक्षणिक गुणवत्ता पर भी पड़ सकता है।
सरकार ने विस्तार का रास्ता चुना है। अब गुणवत्ता की जिम्मेदारी भी उसी गंभीरता से निभानी होगी।
स्थायी भवनों का निर्माण सर्वोच्च प्राथमिकता होना चाहिए। निर्माण कार्य वर्षों तक लंबित रहने की परंपरा इस योजना को कमजोर कर सकती है। यदि अस्थायी व्यवस्था ही लंबे समय तक स्थायी बन गई, तो उद्देश्य अधूरा रह जाएगा। साथ ही शिक्षकों की नियमित नियुक्ति भी आवश्यक है। उच्च शिक्षा को केवल संविदा व्यवस्था के भरोसे लंबे समय तक नहीं चलाया जा सकता। विश्वविद्यालयों को स्थायी शैक्षणिक नेतृत्व चाहिए। छात्रों को निरंतर मार्गदर्शन चाहिए। संस्थानों को अकादमिक स्थिरता चाहिए। इतना ही जरूरी है कि पुराने कालेजों के रिक्त पद भी शीघ्र भरे जाएं। नए कालेजों को मजबूत करने के लिए पुराने संस्थानों को कमजोर करना टिकाऊ समाधान नहीं हो सकता। शिक्षा में सबसे महत्वपूर्ण बात इमारत का उद्घाटन नहीं, ज्ञान का वातावरण है। बिहार ने नए कालेज खोलकर एक मजबूत शुरुआत की है। अब जरूरत है कि इस शुरुआत को गुणवत्ता, संसाधन और जवाबदेही से जोड़ा जाए। क्योंकि इतिहास कालेजों की संख्या नहीं गिनता, उनकी गुणवत्ता को याद रखता है।








