- 10 जून को 96 वर्ष की आयु में ली अंतिम सांस
- सिमरिया के पावन तट पर हुआ अंतिम संस्कार
बेगूसराय | बेगूसराय के लिए 10 जून 2026 केवल एक चिकित्सक के निधन का दिन नहीं था, बल्कि उस पीढ़ी के अवसान का क्षण था जिसने पेशे को सेवा और समाज के प्रति उत्तरदायित्व का माध्यम माना। प्रख्यात चिकित्सक डॉ. एसके लाल ने 96 वर्ष 4 माह की आयु में पोखरिया स्थित आवास पर अंतिम सांस ली। उनके निधन की सूचना मिलते ही चिकित्सा जगत, सामाजिक संगठनों और आम लोगों के बीच शोक की लहर दौड़ गई। गुरुवार को सिमरिया तट पर उनका अंतिम संस्कार किया गया।

विदेश में बसने के बजाय बेगूसराय की सेवा को चुना
डॉ. लाल का जीवन आज के समय में उस प्रश्न को भी सामने लाता है कि क्या समाज अपने सच्चे कर्मयोगियों को समय रहते पहचान और सम्मान दे पाता है? दरभंगा जिले के गोढ़ैला गांव में 2 जनवरी 1931 को जन्मे डॉ. लाल ने कठिन परिस्थितियों में शिक्षा प्राप्त की और 1955 में दरभंगा मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस की डिग्री हासिल की। 1964 में वे एमआरसीपी जैसी प्रतिष्ठित डिग्री प्राप्त करने के लिए एडिनबरा गए। उस दौर में विदेशों में बस जाना अधिकांश चिकित्सकों का सपना माना जाता था, लेकिन डॉ. लाल ने अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों के आकर्षक प्रस्तावों को अस्वीकार कर स्वदेश लौटने का निर्णय लिया। उनके सामने महानगरों और विदेशों में अपार संभावनाएं थीं, लेकिन उन्होंने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा उस बेगूसराय को समर्पित किया, जहां उस समय चिकित्सा सुविधाएं बेहद सीमित थीं। सदर अस्पताल में उनकी नियुक्ति के बाद जिले के लोगों को एक ऐसे चिकित्सक का साथ मिला, जिसने चिकित्सा को केवल नौकरी या कमाई का माध्यम नहीं बनाया। बाद में जब उनका ट्रांसफर पटना किया गया तो उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया और उन दिनों चिकित्सा के क्षेत्र में पिछड़े बेगूसराय की सेवा में लगे रहे।

कालाजार अनुसंधान में दिया योगदान
डॉ. लाल ने हजारों मरीजों का उपचार किया, चिकित्सा शिक्षा और शोध को बढ़ावा दिया तथा कालाजार जैसी गंभीर बीमारी पर अपने कार्य से राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई। वे इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) के तीन बार सफल अध्यक्ष रहे और उनके कार्यकाल को देश में सर्वश्रेष्ठ माना गया। वे एपीआइ बिहार चैप्टर के अध्यक्ष भी रहे। चिकित्सा विज्ञान के विकास और चिकित्सकीय मूल्यों की स्थापना के लिए उनका योगदान हमेशा याद किया जाएगा।

राष्ट्रीय सम्मान नहीं मिला, लेकिन जनसेवा ने उन्हें अमर बनाया
उनका जीवन एक और सामाजिक सच्चाई की ओर भी ध्यान आकर्षित करता है। समाज जिन लोगों की सेवाओं का लाभ जीवनभर उठाता है, उन्हें अक्सर वह सम्मान नहीं मिल पाता जिसके वे वास्तविक हकदार होते हैं। अपने जीवन के अंतिम वर्षों में डॉ. लाल को यह महसूस होता था कि चिकित्सा और शोध के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए उन्हें पद्मश्री जैसे राष्ट्रीय सम्मान से नवाजा जाना चाहिए। कई प्रयास हुए, आवेदन भी भेजे गए, लेकिन अंततः यह सम्मान उन्हें नहीं मिल सका। यह केवल एक व्यक्ति की उपेक्षा नहीं, बल्कि उन अनगिनत कर्मयोगियों की कहानी है जो प्रचार से दूर रहकर समाज के लिए जीवन समर्पित कर देते हैं।
हजारों मरीजों के लिए थे भरोसे का नाम
डॉ. एसके लाल अपने पीछे दो पुत्र, दो पुत्रियां और भरा-पूरा परिवार छोड़ गए हैं। लेकिन उनकी सबसे बड़ी विरासत वह विश्वास है जो उन्होंने मरीजों के मन में डॉक्टर और चिकित्सा व्यवस्था के प्रति स्थापित किया। ऐसे समय में जब चिकित्सा क्षेत्र पर व्यवसायीकरण के आरोप लगते हैं, डॉ. लाल का जीवन नई पीढ़ी के चिकित्सकों के लिए यह संदेश छोड़ गया है कि ज्ञान, संवेदना और समाज के प्रति समर्पण ही किसी डॉक्टर की सबसे बड़ी पहचान होती है। उनकी विदाई एक व्यक्ति का निधन भर नहीं, बल्कि सेवा, सादगी और सामाजिक उत्तरदायित्व के उस आदर्श का स्मरण है जिसकी आज पहले से कहीं अधिक आवश्यकता है।










