
‘लोकसेवक’ सिर्फ एक पद का नाम नहीं है। यह भारतीय शासन व्यवस्था का सबसे बड़ा नैतिक और संवैधानिक परिचय है। इसका सीधा मतलब है—जिम्मेदारी। एक अधिकारी को जो ताकत मिली है, वह जनता की है। वह उस ताकत का मालिक नहीं है, बल्कि उसका पहरेदार है। उसका अधिकार कानून से आता है और कानून से ही नियंत्रित होता है। वह अनुशासन लागू कर सकता है, लेकिन कानून से बाहर जाकर नहीं। वह आदेश दे सकता है, लेकिन संविधान के दायरे में रहकर। संक्षेप में कहें तो, कोई भी अधिकारी दूसरों की जिम्मेदारी तय कर सकता है, लेकिन खुद अपनी जिम्मेदारी से भाग नहीं सकता।
यहीं से प्रशासनिक व्यवस्था का सबसे बड़ा सवाल उठता है। आज दफ्तरों में क्या स्थिति है? अगर किसी कनिष्ठ /सहायक कर्मियों से कोई गलती हो जाए, तो उस पर तुरंत विभागीय कार्रवाई का डंडा चल जाता है। लेकिन, बड़े स्तर पर फाइलों का महीनों लटके रहना, फैसलों में बेवजह देरी और काम में सुस्ती पर किसी की जवाबदेही तय नहीं होती। जब जवाबदेही सिर्फ नीचे वालों के लिए कठोर और ऊपर वालों के लिए नरम हो, तो व्यवस्था पर सवाल उठना लाजिमी है। यह सोच न सिर्फ छोटे कर्मचारियों का मनोबल तोड़ती है, बल्कि प्रशासन की निष्पक्षता पर भी गहरा दाग लगाती है।
अक्सर कहा जाता है कि कर्मचारियों के कुछ बोलने से ‘सरकार की छवि’ खराब हो जाएगी। लेकिन क्या सरकार की छवि सिर्फ बयानों से बनती है? बिल्कुल नहीं। सरकार की असली छवि इन बातों से बनती है कि प्रशासन के काम करने की रफ्तार कैसी है? क्या नियम सबके लिए एक समान हैं? सरकारी दफ्तरों में आम जनता का अनुभव कैसा है? लोगों का व्यवस्था पर कितना भरोसा है? अगर किसी कर्मचारी के बोलने से सरकार की प्रतिष्ठा गिरती है, तो अफसरों की सुस्ती, फैसलों में देरी और खराब होती जन-सुविधाओं से भी छवि खराब होती है। इसे भी उसी तराजू पर तौला जाना चाहिए। लोकतंत्र में जिम्मेदारी कभी एकतरफा नहीं हो सकती।
लोकतंत्र का मूल मंत्र यही है कि जिसके पास अधिकार है, उसके पास जिम्मेदारी भी होनी चाहिए। जब सारे अधिकार ऊपर सिमट जाएं और सारी जवाबदेही नीचे वालों पर डाल दी जाए, तो यह ‘लोकसेवा’ नहीं, ‘प्रभुत्व’ (तानाशाही) की संस्कृति बन जाती है। हमारे संविधान ने कभी ऐसी व्यवस्था की न तो कल्पना की थी और न ही इसे स्वीकारा है। आज सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि सरकारी कर्मचारी क्या बोल सकते हैं और क्या नहीं। असली सवाल यह है कि क्या प्रशासन खुद भी उसी जवाबदेही के लिए तैयार है, जिसकी उम्मीद वह अपने अधीनस्थ कर्मचारियों से करता है? इसी सवाल का जवाब यह तय करेगा कि हमारी व्यवस्था संविधान की भावना से चल रही है, या आज भी अंग्रेजों की दी हुई ‘औपनिवेशिक मानसिकता’ में जी रही है।








