Download App from

सवाल पूछना बगावत नहीं

क्या किसी प्रशासनिक अधिकारी के फैसले पर सवाल उठाना सरकार की आलोचना है? यह महज सरकारी कर्मचारियों के आचरण से जुड़ा विवाद नहीं है, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की संवैधानिक आत्मा से उठा एक गंभीर प्रश्न है।

क्या किसी प्रशासनिक अधिकारी के फैसले पर सवाल उठाना सरकार की आलोचना है? यह महज सरकारी कर्मचारियों के आचरण से जुड़ा विवाद नहीं है, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की संवैधानिक आत्मा से उठा एक गंभीर प्रश्न है। यदि किसी अधिकारी के आदेश या कार्यशैली की वैधानिक समीक्षा को ही ‘सरकार की आलोचना’ मानकर दबा दिया जाए तो लोकतंत्र और नौकरशाही के बीच संविधान द्वारा खींची गई लक्ष्मण रेखा धुंधली होने लगती है। जब शासन कानून से कम और ‘पद के अहंकार’ से अधिक संचालित होने लगे तो यह किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए खतरे की घंटी है।

हाल के वर्षों में सरकारी सेवकों की सार्वजनिक अभिव्यक्ति, विशेषकर सोशल मीडिया पर उनके विचारों को लेकर तंत्र का रवैया बेहद कठोर हुआ है। इसमें कोई दो राय नहीं कि सेवा अनुशासन, सरकारी गोपनीयता और संस्थागत गरिमा किसी भी प्रशासनिक ढांचे की रीढ़ होते हैं। संविधान का अनुच्छेद 309 राज्य को यह अधिकार देता है कि वह कर्मचारियों के लिए आचरण नियम बनाए। ये नियम प्रशासन को सुचारू रूप से चलाने के लिए आवश्यक हैं, न कि लोकतांत्रिक मूल्यों का गला घोंटने के लिए। लोकतंत्र में किसी भी नियम की असली कसौटी उसका वजूद नहीं, बल्कि उसका उपयोग होता है।

संविधान इस संतुलन को बहुत बारीकी से साधता है
अनुच्छेद 14: राज्य की हर कार्रवाई को मनमानी से मुक्त रहने की हिदायत देता है।
अनुच्छेद 19(1)(क): अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है (यद्यपि सेवा अनुशासन के तहत इस पर ‘युक्तियुक्त सीमाएं’ लागू होती हैं)।
अनुच्छेद 311: यह सुनिश्चित करता है कि किसी भी कर्मचारी पर दंडात्मक कार्रवाई प्राकृतिक न्याय और विधिसम्मत प्रक्रिया के तहत ही हो।
इन प्रावधानों का संयुक्त संदेश बिल्कुल स्पष्ट है—प्रशासन में अनुशासन अनिवार्य है, लेकिन इसके नाम पर मनमानी को कभी जायज नहीं ठहराया जा सकता।

“सरकार” आखिर है कौन?
यहीं से इस पूरे विमर्श का सबसे बुनियादी सवाल खड़ा होता है कि आखिर लोकतांत्रिक व्यवस्था में “सरकार” कौन है? इसका उत्तर स्वयं हमारा संविधान देता है। सरकार वह निर्वाचित राजनीतिक कार्यपालिका है, जिसे जनता अपना जनादेश सौंपती है। दूसरी ओर, प्रशासनिक अधिकारी उस सरकार की नीतियों को ज़मीन पर उतारने वाले ‘लोकसेवक’ हैं। वे शासन-तंत्र का एक अहम पुर्जा जरूर हैं, लेकिन वे स्वयं ‘सरकार’ नहीं हैं। प्रशासनिक पदानुक्रम महज जिम्मेदारियों का एक ढांचा है; यह किसी भी अधिकारी को न तो संविधान से ऊपर रखता है और न ही उसे सरकार का पर्याय बनाता है। दुर्भाग्य से, व्यावहारिक धरातल पर सत्ता के गलियारों में यह अंतर अक्सर मिटता हुआ दिखाई देता है।

आज स्थिति यह बन गई है कि यदि कोई कर्मचारी किसी प्रशासनिक आदेश को नियमों या कानूनी प्रावधानों की कसौटी पर कसने का प्रयास करता है, तो उसे अक्सर असहमति जताने वाला नहीं, बल्कि ‘अनुशासनहीन’ मान लिया जाता है। सवाल यह नहीं है कि कर्मचारी हमेशा सही होता है; असली सवाल यह है कि क्या किसी आदेश को सिर्फ इसलिए अंतिम और निर्विवाद मान लिया जाए क्योंकि उस पर किसी ‘वरिष्ठ अधिकारी’ के हस्ताक्षर हैं? यदि किसी फैसले की वैधानिक और तार्किक समीक्षा का अधिकार ही व्यवस्था से खत्म कर दिया जाए, तो ‘संविधान की सर्वोच्चता’ धीरे-धीरे ‘पद की सर्वोच्चता’ में तब्दील हो जाएगी।

एक परिपक्व लोकतंत्र में सत्ता का सबसे बड़ा परीक्षण यह नहीं है कि वह अपने आलोचकों को कितनी सख्ती से चुप करा सकती है, बल्कि यह है कि वह स्वयं को वैधानिक समीक्षा के लिए कितना खुला रखती है। निर्वाचित सरकार की नीति और किसी नियुक्त अधिकारी के निर्णय के बीच अंतर करना इसलिए भी ज़रूरी है ताकि नौकरशाही की जवाबदेही तय की जा सके। यदि इन दोनों के बीच की संवैधानिक रेखा मिट गई, तो प्रशासन में पारदर्शिता और उत्तरदायित्व का पूरा ढांचा ही चरमरा जाएगा। लोकतंत्र में सवाल पूछना बगावत नहीं, बल्कि व्यवस्था को जीवंत बनाए रखने की एक अनिवार्य शर्त है।

Picture of शेखर

शेखर

पत्रकारिता ही की है अब तक।
3 1 vote
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest
0 Comments
Oldest
Newest Most Voted

Share this post:

खबरें और भी हैं...

लाइव क्रिकट स्कोर

HUF Registration Services In India
Digital marketing for news publishers

कोरोना अपडेट

Weather Data Source: wetter in Indien morgen

राशिफल

error: Content is protected !!
0
Would love your thoughts, please comment.x
()
x