
बिहार में शिक्षा व्यवस्था को लेकर एक बार फिर उम्मीदों का नया सवेरा दिखाने की कोशिश की गई है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने एक बेहद महत्वाकांक्षी योजना का आगाज किया है। पटना के 10 माडल स्कूलों में मुफ्त JEE और NEET कोचिंग की शुरुआत हुई है। मकसद साफ और नेक है। प्रदेश के गरीब, मेधावी और साधनहीन छात्र बिना भारी-भरकम फीस चुकाए डाक्टर और इंजीनियर बनने का सपना पूरा कर सकें। पहल निश्चित रूप से स्वागत योग्य है। पहले चरण में छात्रों का उत्साह भी दिखा है। JEE के लिए 266 और NEET के लिए 252 छात्रों ने अपना पंजीकरण कराया है। योजना है कि जल्द ही इसे राज्य के 155 माडल स्कूलों तक ले जाया जाएगा। सपने बड़े हैं और सरकारी दावे भी बेहद आकर्षक। बताया जा रहा कि इन स्कूलों में अत्याधुनिक स्मार्ट क्लास होंगे। कक्षाएं पूरी तरह से आधुनिक और डिजिटल होंगी। और सबसे अहम कि बच्चों को निर्बाध हाई-स्पीड इंटरनेट की सुविधा मिलेगी। बच्चे देश के सर्वश्रेष्ठ शिक्षकों से आनलाइन लाइव क्लास ले सकेंगे। सुनने में यह सब किसी सुनहरे ख्वाब जैसा लगता है, लेकिन जब हम सरकारी फाइलों और दावों की दुनिया से बाहर निकलते हैं, तो जमीनी हकीकत एक अलग ही कहानी बयां करती है।
क्या यह सब इतना आसान है? क्या हमारा सरकारी तंत्र इस बड़े सपने का बोझ उठाने के लिए वाकई तैयार है?
एक तरफ सरकार निर्बाध वाई-फाई और स्मार्ट क्लास की बात कर रही है। दूसरी तरफ, स्कूलों में बुनियादी नेटवर्क तक की घोर कमी है। हाल ही में शिक्षा विभाग ने शिक्षकों के लिए आनलाइन हाजिरी (ई-शिक्षाकोष पोर्टल) अनिवार्य कर दी है, लेकिन नेटवर्क की कमी के कारण शिक्षक रोज हलकान हो रहे हैं। वे स्कूल परिसर में अपनी उपस्थिति तक दर्ज नहीं करा पा रहे हैं। आलम यह है कि कई जगह शिक्षकों को स्कूल से बाहर निकलकर नेटवर्क तलाशना पड़ रहा है। ऐसे में सवाल लाजिमी है। जब एक मामूली सरकारी एप पर हाजिरी बनाने के लिए स्कूलों में इंटरनेट नहीं है, तो फिर घंटों चलने वाली हाई-स्पीड लाइव क्लास कैसे चलेगी? बिना बफरिंग के आइआइटी के प्रोफेसर बच्चों को कैसे पढ़ाएंगे? अब बात करते हैं बुनियादी ढांचे की। शिक्षा विभाग कह रहा कि कक्षाओं में टाइल्स लगे होंगे। स्मार्ट क्लासरूम का माहौल किसी कारपोरेट दफ्तर या महानगरों के निजी कोचिंग संस्थानों जैसा होगा। लेकिन प्रदेश के ज्यादातर स्कूलों की इमारतें आज भी जर्जर अवस्था में हैं। कई स्कूलों में बरसात के दिनों में छत से पानी टपकता है। दीवारों पर सीलन है और प्लास्टर टूट कर गिर रहा है। जिन 10 मॉडल स्कूलों को अभी पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर चुना गया है, वहां शायद रातों-रात रंग-रोगन करके कुछ व्यवस्था कर दी जाए, लेकिन जब इस योजना का विस्तार 155 स्कूलों या उससे आगे ग्रामीण इलाकों तक होगा, तब क्या होगा? क्या सरकार रातों-रात इन सभी स्कूलों की बुनियादी संरचना को बदल कर रख देगी?
जब कोई साधारण परिवार का बच्चा JEE और NEET की तैयारी शुरू करता है, तो वह अपना और अपने परिवार का सब कुछ दांव पर लगाता है।
जरा सोचिए, अगर स्मार्ट क्लास के बीच में इंटरनेट बंद हो जाए, तो क्या होगा? अगर भौतिकी या रसायन विज्ञान का कोई अहम कॉन्सेप्ट समझाते वक्त वीडियो बफर होने लगे और आवाज कटने लगे, तो क्या वह बच्चा उन कॉन्सेप्ट को समझ पाएगा? आधी-अधूरी और नेटवर्क की मोहताज तैयारी से सिर्फ छात्रों का समय बर्बाद होगा और उनका मनोबल टूटेगा। सरकार को यह समझना होगा कि मुफ्त कोचिंग की इस व्यवस्था को सफल बनाने के लिए एक पूरे ‘इकोसिस्टम’ की जरूरत है। सिर्फ घोषणाएं काफी नहीं हैं। निर्बाध बिजली चाहिए। हर स्कूल में हाई-स्पीड ऑप्टिकल फाइबर या डेडिकेटेड लीज्ड लाइन इंटरनेट चाहिए। और सबसे बढ़कर, ऐसे तकनीकी कर्मचारियों की फौज चाहिए जो किसी भी तकनीकी खराबी को तुरंत मौके पर ही ठीक कर सकें। इन सवालों और शंकाओं का मकसद सरकार की आलोचना करना कतई नहीं है। बल्कि, नीति-निर्माताओं को आईना दिखाना है। रकार को अपनी कार्यप्रणाली बदलनी होगी। हवा-हवाई दावों और सिर्फ वाहवाही लूटने वाली घोषणाओं से बचना होगा। सबसे पहले ‘डिजिटल डिवाइड’ और नेटवर्क की समस्या का स्थायी समाधान खोजना होगा। स्कूलों के बुनियादी ढांचे को कागजों पर नहीं, बल्कि जमीन पर मजबूत करना होगा।
बिहार के छात्रों में मेधा और प्रतिभा की कोई कमी नहीं है। वे संसाधनों के घोर अभाव में भी अपनी मेहनत से इतिहास रचते आए हैं।
यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि अच्छी नीयत के साथ-साथ नीतियों का ईमानदारी से क्रियान्वयन भी उतना ही जरूरी है। बच्चों के सुनहरे भविष्य के साथ केवल ‘ट्रायल एंड एरर’ का खेल नहीं खेला जा सकता। सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि ‘स्मार्ट क्लास’ की यह पहल केवल एक राजनीतिक जुमला या अखबारी सुर्खियों तक सीमित रहकर न रह जाए। जब तक स्कूलों की चारदीवारी मजबूत नहीं होगी, जब तक इंटरनेट की गति बिना रुके दौड़ेगी नहीं, तब तक सफलता का यह सरकारी सपना जमीनी हकीकत से कोसों दूर रहेगा। समय रहते कमियों को पहचान कर उन्हें दूर करना ही एक मजबूत और शिक्षित बिहार की सच्ची नींव रख सकता है।








