- 1972 में 15 वर्ष की उम्र में शुरू की थी पहली कांवर यात्रा
- कोरोना काल में भी नहीं टूटी जलाभिषेक की परंपरा
- इस बार 12 श्रद्धालुओं के दल के साथ देवघर के लिए होंगे रवाना
मुजफ्फरपुर। श्रावण मास आते ही भगवान शिव के जयकारों से पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठता है। सुल्तानगंज की उत्तरवाहिनी गंगा से जल लेकर देवघर स्थित बाबा वैद्यनाथ धाम में जलाभिषेक करने की सदियों पुरानी परंपरा आज भी करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। इसी परंपरा को अपनी अटूट श्रद्धा और संकल्प से जीवंत बनाए हुए हैं सरैया प्रखंड के नरगी जीवनाथ गांव निवासी वरिष्ठ साहित्यकार डा. एमके गिरि ‘राकेश’। वे लगातार 55 वर्षों से पैदल कांवर यात्रा कर बाबा वैद्यनाथ का जलाभिषेक कर रहे हैं। शुक्रवार को डा. राकेश अपने संगठन ‘सत्यम शिवम सुंदरम कांवरिया संघ’ के बैनर तले 55वीं कांवर यात्रा पर रवाना हुए। यात्रा शुरू करने से पहले वे अपने साथियों के साथ मुजफ्फरपुर के बाबा गरीबनाथ मंदिर में विधिवत पूजा-अर्चना की। इसके बाद सुल्तानगंज से गंगाजल लेकर देवघर के लिए पैदल प्रस्थान किया।
आज भी पहले जैसा ही उत्साह
डा. राकेश बताते हैं कि उन्होंने वर्ष 1972 में, जब वे आरपीएस कालेज, जैतपुर में इंटरमीडिएट के छात्र थे, मात्र 15 वर्ष की आयु में पहली बार कांवर उठाई थी। तब से हर सावन बाबा का बुलावा उन्हें देवघर तक खींच लाता है। उस समय यात्रा आसान नहीं थी। कच्चे रास्ते, नदी-नाले और पथरीले मार्ग श्रद्धालुओं की परीक्षा लेते थे। आज सुविधाएं बढ़ी हैं, लेकिन उनकी भक्ति और उत्साह पहले जैसा ही बना हुआ है।

1984 में गठित हुआ संघ, पत्नी और ग्रामीण भी बनते हैं हमसफर
वर्ष 1984 में ग्रामीणों और श्रद्धालुओं के आग्रह पर उन्होंने ‘सत्यम शिवम सुंदरम कांवरिया संघ’ की स्थापना की। तब से हर साल इस संघ के माध्यम से बड़ी संख्या में महिला और पुरुष श्रद्धालु बाबा धाम की यात्रा करते हैं। पिछले तीन दशकों से पत्नी इंदिरा देवी भी इस आध्यात्मिक यात्रा में साथ रहती हैं। इस बार उनकी पुत्रवधू शिक्षिका रेणु रंजन सहित 12 कांवरियों का दल यात्रा पर है। नरगी जीवनाथ के अलावा नरगी जगदीश, अमैठा, सिरकोहिया, बरौना, मठिया, कोलवारा और धनुपरा समेत आसपास के गांवों के श्रद्धालु भी हर वर्ष उनके साथ बाबा धाम जाने के लिए उत्साहित रहते हैं। अब तक वे सैकड़ों शिवभक्तों को सुरक्षित और व्यवस्थित ढंग से कांवर यात्रा करा चुके हैं।
कोरोना काल में भी नहीं टूटी परंपरा
उनकी आस्था का सबसे बड़ा उदाहरण कोरोना काल में देखने को मिला। जब देवघर यात्रा पर रोक थी, तब भी उन्होंने अपनी 55 वर्षों की परंपरा नहीं टूटने दी। उन्होंने नून कदाने नदी से जल लेकर अपने गांव के ऐतिहासिक जीवेश्वर महादेव मंदिर में बाबा वैद्यनाथ के प्रतीक स्वरूप जलाभिषेक किया और श्रद्धा की अखंड ज्योति को जलाए रखा। संघ के सदस्य कृष्णा साह बताते हैं कि लाखों कांवरियों की भीड़ के बीच डा. राकेश एक अभिभावक की तरह सभी का मार्गदर्शन करते हैं। उनके अनुभव, अनुशासन और नेतृत्व के कारण हर वर्ष यात्रा सुरक्षित, व्यवस्थित और श्रद्धामय वातावरण में पूरी होती है। श्रावण मास में डा. एमके गिरि ‘राकेश’ की यह 55 वर्षों की निरंतर कांवर यात्रा केवल व्यक्तिगत आस्था की मिसाल नहीं है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए श्रद्धा, संकल्प और सनातन परंपरा के संरक्षण का प्रेरक उदाहरण भी है।










