बांकीपुर में भाजपा का चुनाव हारना साधारण नहीं है। नीतीश कुमार के सीएम की कुर्सी त्यागने के बाद यह पहला चुनाव है। गौर कीजिए, सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने, नीतीन नवीन के भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने और संजय सरावगी के प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद प्रदेश में पहला चुनाव तो बांकीपुर ही था। चुनाव की इस पहली परीक्षा में नीतीन नवीन, सम्राट व सरावगी तीनों ही फेल हो गए। वह भी एकमात्र ऐसी सीट पर जिसे जीतने के लिए सारा मंत्रिमंडल तक उतर चुका था।
अब सवाल यह है कि क्या भाजपा आगामी लोकसभा का चुनाव और आगे विधानसभा का चुनाव इस टीम के भरोसे लड़ सकती है? अगर नहीं, तो बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में मिली हार की गाज भाजपा में किसी न किसी के सिर तो गिरेगा ही। हालांकि यह देखने के लिए छह माह का इंतजार करना पड़ेगा। प्रदेश में भाजपा का पहला मुख्यमंत्री बनने के बाद यह पहला चुनाव था। ऐसे में बांकीपुर में पार्टी की हार से सीएम सम्राट चौधरी सदमे में तो होंगे ही, लेकिन जन सुराज के नेता और बांकीपुर के विधायक प्रशांत किशोर उन्हें संजीवनी बूटी दे रहे हैं। यह तो जग-जाहिर है कि भाजपा किसी के दबाव में मुख्यमंत्री नहीं बदलती है। ऐसे में सम्राट चौधरी के सीएम पद पर कोई संकट मंडराता नहीं दिखाई दे रहा है।
संजय सरावगी : प्रथम ग्रासे मक्षिका पातः
संजय सरावगी के प्रदेश भाजपा अध्यक्ष बनने के बाद बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव पहला अवसर था। परिणाम के बाद सरावगी के लिए “प्रथम ग्रासे मक्षिका पातः” वाली कहावत चरितार्थ होती दिख रही है। कहावत है कि दूध में गिरे मक्खी को लोग निकाल कर फेंक देते हैं। ऐसे में संजय सरावगी को अगर दूध की मक्खी की तरह फेंक दिया जाय तो कोई अचरज की बात नहीं होगी। जानकार बताते हैं कि भाजपा में संजय सरावगी की भूमिका को लेकर समीक्षा में सबसे पहले इस बात को ध्यान में रखा जा सकता है कि प्रदेश अध्यक्ष के रूप में एनडीए के घटक दलों के शीर्ष नेतृत्व के साथ समन्वय में कहीं उनसे चूक हुई या नहीं। जदयू सुप्रीमो व पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा व केंद्रीय मंत्री ललन सिंह का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलने के निहितार्थ को भी बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में भाजपा प्रत्याशी के पराजय के संदर्भ में देखा जा रहा है। हार के प्रमुख कारणों में एक चुनावी समर के बीच नीतीश कुमार से सक्रिय सहयोग नहीं लेने को भी देखा जा रहा है।
धूमिल होगी नीतीन की नवीन पारी
नीतीन नवीन के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद उनके लिए भी प्रदेश और खासकर उनकी ही छोड़ी गई सीट पर यह पहला चुनाव था। नीतीन ने बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में प्रत्याशी चयन को लेकर जो ओवर कांफिडेंस दिखाया था वह उनके जीवन का बड़ी राजनीतिक भूल साबित हुई है। बिहार के राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि क्या किसी पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष अपनी ही छोड़ी सीट किसी प्रत्याशी के लिए हार सकता है? क्या इस हार के बाद उनकी कुर्सी बची रहेगी? अगर कुर्सी जाएगी तो सवाल राष्ट्रीय अध्यक्ष चुनने वालों पर भी उठेगा। ऐसे में राष्ट्रीय अध्यक्ष को बदलने जैसे सवाल स्वत: गौण पड़ जाते हैं। वैसे भी राष्ट्रीय अध्यक्ष को बदलना भाजपा क्या किसी भी पार्टी के लिए आसान नहीं होता है।
रविशंकर को लगा कुत्ते-बिल्ली का श्राप
फिर बात कुत्ता-बिल्ली वाले बयान पर आकर टिक जाती है। ऐसे बयान देने वाले रविशंकर प्रसाद से भी अब सवाल-जवाब होगा, लेकिन इससे भाजपा को क्या फायदा और रविशंकर प्रसाद को क्या नुकसान होगा, इसे भी देखने की जरूरत है। रविशंकर उम्र के जिस पड़ाव पर हैं वहां से वे क्या खो सकते हैं? पार्टी में पद नहीं सम्मान बड़ा होता है। ऐसे में कुत्ता -बिल्ली वाला बयान उनके लिए एक धब्बा तो है ही। क्योंकि उन्हें सधा हुआ बयान देने वाला माना जाता रहा है। बहरहाल, भाजपा की समीक्षा में क्या त्रुटियां सामने आती हैं इस पर लोगों की नजरें टिकी हैं।











विगत दो दशकों में आत्मसमीक्षा से दूर रखकर गैर ए तमाम के लिए प्रतिशोधी समीक्षक के तौर पर दीक्षित और प्रशिक्षित टीम के पास हिकारत और नफरत के संलाप बांटने के सिवा कुछ और भी शेष बचा हो सकता है क्या ..?
जाते जाते अब बची खुची चंद आखिरी किश्तें रिलीज कर लें ताकि बाद में मलाल न रहे कि कोई कोर कसर बाकी रह गया ।