प्रशांत किशोर बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव क्या जीत गए कि महिमा मंडित करने का दौर शुरू हो गया है। कहा जा रहा है कि अल्पसंख्यकों का वोट राजद से टूटकर जन सुराज में शिफ्ट कर गया। राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के पुत्र व बिहार विधानसभा में प्रतिपक्ष के नेता यादव M-Y समीकरण वाले वोट को भी सुरक्षित नहीं रख पाए। कांग्रेस से तालमेल कर जन सुराज सत्ता हासिल भले ही ना करे, परंतु दूसरे नंबर की पार्टी बन सकती है। इस तरह के नैरेटिव मीडिया सोशल मीडिया पर तैर रहे हैं, लेकिन इसमें कितनी सच्चाई है और सच्चाई से कितनी दूर यह तो वक्त ही बताएगा।
बिहार में बदलाव चाहती है पब्लिक
अल्पसंख्यक वोट जन सुराज के प्रशांत किशोर को मिलने का अर्थ अल्पसंख्यकों का वोट राजद से टूटकर शिफ्ट होना कदापि नहीं हो सकता। अल्पसंख्यकों का एकमात्र उद्देश्य भाजपा को हराना होता है। इस कारण विभिन्न विधानसभा क्षेत्रों में उनका वोट भाजपा विरोधी सशक्त उम्मीदवार को मिलता है। बेशक उन्हें लगा कि पीके भाजपा को हरा सकती है। इस कारण उन्होंने पीके को वोट दिया। किस्मत से तीर निशाने पर लग गई। हां, इसका फायदा जन सुराज को मिल सकता है। कल तक अल्पसंख्यक समुदाय जन सुराज को गंभीरता से नहीं ले रही थी, लेकिन अब लेगी। इसका मतलब यह कतई नहीं हो सकता है कि जन सुराज जिसे उम्मीदवार बना देगी उसे अल्पसंख्यक समुदाय का वोट मिल जाएगा।
चुनाव में प्रत्याशी के भी होते हैं मायने
चुनाव में प्रत्याशी भी मायने रखता है। ऐसा नहीं होता तो बांकीपुर में भाजपा प्रत्याशी को लेकर सवाल खड़े नहीं होते। यहां जन सुराज से प्रशांत किशोर के बदले कोई और प्रत्याशी होता तो संभव है चुनाव परिणाम कुछ और हो जाता। ऐसे में आगामी विधानसभा चुनाव के समय जन सुराज पार्टी कितने क्षेत्रों में सुयोग्य प्रत्याशी दे पाएगी, यह देखने वाली बात होगी। यहां सुयोग्य से मतलब शिक्षा और सामाजिक क्षेत्र में पकड़ से है। आर्थिक रूप से संपन्न भी। क्योंकि चुनाव लड़ना मंहगा हो गया है।
हम फिर लौटकर आते हैं बांकीपुर
बात यादवों वोट में बिखराव की करें तो इस चुनाव में उन्हें भी लगा कि भाजपा को हराने का यह सुनहरा अवसर है। इस कारण यादवों के एक तबके ने पीके को वोट दे दिया। यहां अहम सवाल है कि अगर पीके की जगह जन सुराज के अन्य कोई उम्मीदवार होता तो क्या वोट का ट्रेंड यही होता। जवाब सीधा होगा नहीं।
जरा गौर कीजिए कि इस उपचुनाव में प्रचार को लेकर जदयू सुप्रीमो नीतीश कुमार भी उतर गए होते तो क्या होता। राजनीतिक प्रेक्षक मानते हैं कि तब भाजपा की जीत होती। राजद नेता तेजस्वी यादव भी नामांकन पत्र दाखिल होने के साथ सक्रिय हो गए होते। संभव है कि किसी रणनीति के तहत तेजस्वी ने उतनी सक्रियता नहीं दिखाई हो। कहते हैं जो दिख जाय वह राजनीति नहीं है। अंदरखाने को समझ लेना भी आसान नहीं है। अगर पीके की जीत के आंकड़े को देखें तो ऐसा कि फासले को पाटा नहीं जा सकता था। ऐसे कई सवाल हैं जिसे हल किए बिना कुछ कहा नहीं जा सकता है। हां, इस बात में दम है कि पीके की जीत से जन सुराज के कार्यकर्ताओं का मनोबल ऊंचा हुआ है, जो आगामी चुनावों में असर डालेगा। पीके की पूछ बढ़ी है। राजनीति संभावनाओं का खेल है। संभावना तलाशने में पीके माहिर हैं यह तो उन्होंने बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में साबित कर ही दिया है।








