- आकाश गंगा रंग चौपाल की ओर से 5वां राष्ट्रीय नाट्य महोत्सव आयोजित
बेगूसराय | गरीब होना किस तरह से एक अभिशाप है इस बात को कलर व्हील दरभंगा के नाट्य निर्देशक श्याम कुमार सहनी ने नाटक ‘अष्टावक्र’ में बखूबी दर्शाया। दलित-पीड़ित परिवार को नियति भी नहीं छोड़ती है। ऐसा ही कुछ होता अष्टावक्र के साथ। अष्टावक्र, बूढ़ी मां के साथ अंधेरी व बदबूदार कोठरी में रहता है। टेढ़ा-मेढ़ा शरीर होने के कारण उसका शरीर स्थिर नहीं रहता। उसे बाेलने में भी परेशानी होती है। जिंदगी जीने के लिए खोमचे लगाता है, लेकिन स्पष्ट नहीं बोल पाने के कारण सही तरीके से सामान नहीं बिकता है।

जिदंगी किसी तरह चल रही होती है, लेकिन एक दिन अचानक से बूढ़ी मां को बुखार आ जाता है। पैसे नहीं होने के कारण इलाज भी नहीं हो पाता है। दो-तीन दिन ज्वर में रहने के बाद बूढ़ी मां चल बसती है। कुछ दिन बाद उस कोठरी में रहने के लिए एक कुल्फी वाला आता है। कुल्फीवाला देखने में बूढ़ा है। कुल्फीवाला, अष्टावक्र से कुछ पूछता है। इस पर अष्टावक्र मां को आवाज लगाता है। कुल्फीवाला कहता है कि तुम्हारी मां तो मर गई है। इसके बाद अष्टावक्र मान बैठता है कि मां अब नहीं आएगी और उसे सदमा लगता है। अष्टावक्र रात भर मां-मां कहता रहा। सुबह होने पर कुल्फीवाला उसे अस्पताल में भर्ती कराता है, लेकिन कालचक्र उसे अपनी आगोश में ले लेता है।
किसने कौन सी भूमिका निभाई : ईशा (मां), संदीप कुमार (अष्टावक्र), सौरभ कुमार (कुल्फीवाला), मनोज कुमार और विकास कुमार (डॉक्टर) ।
‘मेरा कुछ सामान’ : बनते-बिगड़ते रिश्तों की कहानी
नाट्य महोत्सव के दौरान अभिरंग फाउंडेशन, मुंबई की ओर से ‘मेरा कुछ सामान’ नाटक की प्रस्तुति दी गई। नाटक को रविकांत मिश्रा ने लिखा है जबकि इसे फिल्म अभिनेता संजय पांडेय ने निर्देशित किया। ‘मेरा कुछ सामान’ नाटक में बनते-बिगड़ते रिश्ते को दिखाया गया है। निर्देशक ने पति-पत्नी की कमियों और खूबियों को बेहतर तरीके से पर्दे पर दिखाया। निर्देशक ने बताया कि किस तरह गलतियों को नजरअंदाज करते हुए रिश्ते निभाने का सब्र कम होता जा रहा है।
नायक अरुण और नायिका सुनीता की अरेंज मैरिज होती है। 12 साल तक रिश्ता चलने के बाद एक दिन दोनों अलग होने का फैसला करते हैं। एक साल तक अलग रहने के बाद दोनों तलाक की अर्जी देते हैं। अलग होने से पहले कोर्ट उन्हें एक महीने और साथ रहने को कहता है। इस एक महीने के दौरान दोनों को अपनी गलती का अहसास होता है और एक महीना पूरा होने से पहले ही दोनों साथ में घर छोड़ने का फैसला करते हैं। पर इस वादे के साथ कि वो इसी छत के नीचे मिलते रहेंगे, क्या पता इसी तरह मिलते-बिछड़ते, लड़ते-झगड़ते वो हमेशा के लिए मिल जाएं, के साथ नाटक समाप्त होता है।
इन्होंने निभाई भूमिका : संजय पांडेय, मनोज टाइगर, दीपा पांडेय, राजन कानू, मंच अभिकल्पना मनीष शिर्के, प्रकाश परिकल्पना महेश विश्वकर्मा, पार्श्व संगीत अनीश सिंह और वेश-भूषा विद्या विष्णु।
भिखारी ठाकुर के संगीत की प्रस्तुति : इस अवसर पर मिथिलांचल कला मंच बीहट के अशोक कुमार पासवान के निर्देशन में भिखारी ठाकुर कृत बारहमासा संगीत की प्रस्तुति निशु, कशिश, रूपाली आिद ने दी। वहीं आकाश गंगा रंग चौपाल के कलाकार आनंद कुमार, बलिराम बिहारी, राजू कुमार, सन्तोष, अंकित, लालू बिहारी, अंजली, निधि, साक्षी, संस्कृति आदि ने गीत और नृत्य की प्रस्तुति दी।
