
वर्ष 2008 में जब आर्थिक रूप से कमजोर मेधावी विद्यार्थियों के लिए राष्ट्रीय आय सह मेधा छात्रवृत्ति योजना (एनएमएमएसएस) की शुरुआत हुई थी, उसी समय जन्मा एक शिशु आज 18 वर्ष का होकर देश के लोकतंत्र में अपना पहला मतदान कर चुका है। इस अवधि में भारत ने डिजिटल क्रांति देखी, शिक्षा व्यवस्था के विस्तार का अनुभव किया, नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति के बड़े लक्ष्य तय किए और बदलती आर्थिक परिस्थितियों के अनुरूप इस छात्रवृत्ति की राशि भी छह हजार रुपये से बढ़ाकर 12 हजार रुपये प्रतिवर्ष कर दी। लेकिन इस पूरी यात्रा में एक तथ्य ऐसा है, जो समय के साथ बदलने से मानो इंकार करता रहा है—इस योजना के तहत मिलने वाली छात्रवृत्तियों की संख्या।
वर्ष 2008 में राष्ट्रीय स्तर पर एक लाख छात्रवृत्तियों का कोटा निर्धारित किया गया था। आश्चर्यजनक रूप से 2026 में भी यह संख्या एक लाख ही है। इन अठारह वर्षों में देश की आबादी लगभग 116 करोड़ से बढ़कर 140 करोड़ से अधिक हो गई। सरकारी विद्यालयों में नामांकन बढ़ा, माध्यमिक शिक्षा तक पहुंच आसान हुई, ग्रामीण और गरीब परिवारों के बच्चों की आकांक्षाएं विस्तृत हुईं और प्रतिस्पर्धा का दायरा पहले से कहीं अधिक व्यापक हुआ। बावजूद अवसरों की संख्या का स्थिर बने रहना एक गंभीर नीतिगत प्रश्न खड़ा करता है। क्या इन वर्षों में मेधावी और आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों की संख्या नहीं बढ़ी या फिर उनकी बढ़ती आवश्यकताओं के अनुरूप हमारी नीतियां स्वयं को अद्यतन नहीं कर पाईं?
यह स्थिति केवल आंकड़ों का मामला नहीं है। यह उस सोच की ओर संकेत करती है, जिसमें योजनाओं की राशि बढ़ाना तो प्राथमिकता बन जाता है, लेकिन लाभार्थियों के दायरे के विस्तार पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया जाता। यदि महंगाई और बदलती परिस्थितियों को देखते हुए छात्रवृत्ति की राशि दोगुनी की जा सकती है तो लाभार्थियों की संख्या की समीक्षा क्यों नहीं? आखिर अवसरों का न्यायपूर्ण वितरण किसी भी कल्याणकारी व्यवस्था की मूल कसौटी है।
इस बहस का एक ऐतिहासिक पक्ष भी है। सामान्य धारणा यह है कि वंचित वर्ग के मेधावी विद्यार्थियों के लिए छात्रवृत्ति व्यवस्था का व्यवस्थित स्वरूप एनएमएमएसएस से शुरू हुआ। जबकि वास्तविकता इससे कहीं अधिक व्यापक है। 1980 और 1990 के दशक में केंद्र और राज्यों के सहयोग से स्टेट मेरिट स्कॉलरशिप, नेशनल मेरिट स्कॉलरशिप, मिडिल स्कूल स्कॉलरशिप, मेरिट-कम-पॉवर्टी स्कॉलरशिप और नेशनल रूरल टैलेंट सर्च जैसी अनेक योजनाएं संचालित थीं। कक्षा पांच और आठ के स्तर पर आयोजित परीक्षाओं के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों तक प्रतिभाओं की पहचान का एक मजबूत तंत्र विकसित हुआ था। अनेक राज्यों में अलग-अलग स्तरों पर छात्रवृत्तियां दी जाती थीं, जिनका उद्देश्य आर्थिक अभाव के कारण प्रतिभा को शिक्षा से वंचित होने से बचाना था।
वर्ष 2008 में प्रशासनिक सरलीकरण और एकीकृत व्यवस्था के नाम पर इन विभिन्न योजनाओं को समेटकर एक प्रकार की ‘सिंगल विंडो’ प्रणाली विकसित की गई। यह कदम प्रबंधन की दृष्टि से सुविधाजनक अवश्य रहा होगा, लेकिन यह प्रश्न आज भी अनुत्तरित है कि इस केंद्रीकरण से अवसरों का वास्तविक दायरा बढ़ा या सिकुड़ गया? यदि पहले संचालित योजनाओं और वर्तमान व्यवस्था के कुल लाभार्थियों का तुलनात्मक विश्लेषण सार्वजनिक नहीं किया जाता तो यह आशंका बनी रहेगी कि कहीं प्रशासनिक सुविधा की कीमत पर मेधावी विद्यार्थियों के अवसर सीमित तो नहीं हो गए।
नई शिक्षा नीति समावेशी और न्यायपूर्ण शिक्षा की बात करती है। सरकारें ‘अमृतकाल’ में विकसित भारत का लक्ष्य सामने रखती हैं और मानव संसाधन को देश की सबसे बड़ी शक्ति बताती हैं। ऐसे में यह स्वाभाविक अपेक्षा है कि प्रतिभा को अवसरों से जोड़ने वाली योजनाओं का दायरा भी समय के साथ विस्तृत हो। छात्रवृत्ति केवल आर्थिक सहायता नहीं होती, वह सामाजिक गतिशीलता का माध्यम भी होती है। अनेक गरीब परिवारों के लिए यह शिक्षा जारी रखने की आशा, आत्मविश्वास और भविष्य की संभावनाओं का आधार बनती है।
इसलिए अब समय आ गया है कि राष्ट्रीय आय सह मेधा छात्रवृत्ति योजना की व्यापक समीक्षा की जाए। केवल छात्रवृत्ति की राशि ही नहीं, बल्कि लाभार्थियों की संख्या, राज्यों के हिस्से, चयन प्रक्रिया और योजना की वास्तविक पहुंच का भी पुनर्मूल्यांकन होना चाहिए। देश को यह जानने का अधिकार है कि पिछले चार दशकों में छात्रवृत्ति व्यवस्था का वास्तविक विस्तार हुआ है या अवसरों का दायरा सिमटता चला गया है। क्योंकि विकसित भारत का सपना तभी सार्थक होगा जब प्रतिभा का भविष्य किसी स्थिर आंकड़े का बंधक नहीं, बल्कि बदलते समय के अनुरूप विस्तृत अवसरों का साझेदार बने।
(नोट :- दूसरी कड़ी कल …)








