
राष्ट्रीय आय सह मेधा छात्रवृत्ति योजना (NMMSS) एक बार फिर नीति-निर्माताओं के सामने खड़ी है। शिक्षा मंत्रालय द्वारा वर्ष 2022 में जारी अधिसूचना के अनुसार वर्ष 2008 में निर्धारित छात्रवृत्ति ढांचे को केवल 2026 तक का विस्तार दिया गया था। अब वह समय आ पहुंचा है जब इस योजना का पुनर्मूल्यांकन अपरिहार्य हो गया है। यह केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि देश की शैक्षिक प्रतिबद्धताओं की परीक्षा का क्षण है।
प्रश्न यह है कि क्या अठारह वर्ष पहले निर्मित अवसरों की संरचना आज के भारत की आवश्यकताओं के अनुरूप है? वर्ष 2008 और वर्ष 2026 के भारत के बीच लंबी दूरी तय हो चुकी है। जनसंख्या बढ़ी है। विद्यालयों में नामांकन बढ़ा है। शिक्षा तक पहुंच का दायरा विस्तृत हुआ है। नई शिक्षा नीति लागू हुई है। डिजिटल संसाधनों का प्रसार हुआ है, लेकिन राष्ट्रीय मेधा छात्रवृत्ति योजना की मूल संरचना लगभग वहीं खड़ी दिखाई देती है, जहां वह अठारह वर्ष पहले थी।
सबसे पहला सवाल राष्ट्रीय कोटे का है। देशभर के लिए निर्धारित एक लाख छात्रवृत्तियों की संख्या आज भी अपरिवर्तित है। जब विद्यार्थियों की संख्या, प्रतिस्पर्धा और शैक्षिक आकांक्षाएं लगातार बढ़ी हैं, तब क्या अवसरों की संख्या स्थिर रहनी चाहिए? यदि देश बदल गया है तो अवसरों का आकार भी बदलना चाहिए। दूसरा सवाल वितरण प्रणाली का है। राज्यों के लिए छात्रवृत्ति कोटा किन मानकों पर निर्धारित होता है, इसकी पारदर्शिता लंबे समय से बहस का विषय रही है। यदि किसी राज्य में विद्यार्थियों की संख्या अधिक है, तो उसके हिस्से में अवसर भी उसी अनुपात में आने चाहिए। यही समान अवसर का मूल सिद्धांत है।
बिहार देश के उन राज्यों में है जहां विद्यालयी आयु वर्ग की आबादी अत्यंत बड़ी है। यहां लाखों विद्यार्थी सीमित संसाधनों के बीच अपनी प्रतिभा के बल पर आगे बढ़ने का प्रयास करते हैं। राष्ट्रीय आय सह मेधा छात्रवृत्ति जैसी योजनाएं उनके लिए केवल आर्थिक सहायता नहीं, बल्कि आगे बढ़ने की प्रेरणा भी होती हैं। इसके बावजूद राज्य को मिलने वाले अवसरों और वास्तविक छात्र-आबादी के बीच का अंतर लगातार सवाल खड़े करता रहा है। यह मांग किसी विशेष रियायत की नहीं है। यह केवल न्यायपूर्ण हिस्सेदारी की मांग है।
तीसरा प्रश्न छात्रवृत्ति राशि का है। जिस राशि का निर्धारण लगभग दो दशक पहले किया गया था, वह आज की परिस्थितियों में अपनी प्रभावशीलता खोती दिखाई देती है। शिक्षा का खर्च लगातार बढ़ा है। पुस्तकें महंगी हुई हैं। डिजिटल शिक्षा की आवश्यकताएं बढ़ी हैं। ऐसे में छात्रवृत्ति राशि को समयानुकूल बनाना नीतिगत आवश्यकता है, विकल्प नहीं। इसे कम-से-कम 15 से 18 हजार रुपये प्रतिवर्ष तक बढ़ाने पर गंभीर विचार होना चाहिए। क्या यह स्वीकार किया जा सकता है कि वर्ष 2008 में निर्धारित छात्रवृत्ति लाभार्थियों की संख्या ही वर्ष 2026 के भारत के लिए भी पर्याप्त है? क्या देश की बढ़ती छात्र आबादी, बढ़ती प्रतिस्पर्धा और बदलती शैक्षिक चुनौतियों का कोई प्रभाव नीति पर नहीं पड़ना चाहिए? यदि अवसरों का विस्तार नहीं होगा तो समान अवसर का सिद्धांत केवल दस्तावेजों की भाषा बनकर रह जाएगा।
आज आवश्यकता किसी नई योजना की नहीं है। आवश्यकता उस योजना को वर्तमान समय के अनुरूप बनाने की है, जो कभी सामाजिक न्याय और शैक्षिक समानता के उद्देश्य से शुरू की गई थी। राष्ट्रीय कोटे की समीक्षा हो। राज्यवार वितरण के आधार सार्वजनिक हों। बिहार जैसे उच्च छात्र-घनत्व वाले राज्यों की स्थिति का पुनर्मूल्यांकन हो। छात्रवृत्ति राशि बढ़ाई जाए। और सबसे महत्वपूर्ण, अवसरों की संख्या को वर्तमान वास्तविकताओं के अनुरूप पुनर्निर्धारित किया जाए। यह बहस अब केवल एनएमएमएसएस तक सीमित नहीं रही है। यह उस व्यापक प्रश्न का हिस्सा बन चुकी है कि भारत अपने मेधावी और आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों के लिए अवसरों का विस्तार कर रहा है या अवसरों को स्थिर बनाए हुए है।
शिक्षा मंत्रालय, नीति आयोग और संसद के सामने यह एक ऐतिहासिक अवसर है। वे चाहें तो इस योजना को महज एक पुरानी प्रशासनिक व्यवस्था की तरह आगे बढ़ा सकते हैं। या फिर इसे बदलते भारत की आकांक्षाओं के अनुरूप नया स्वरूप दे सकते हैं। बिहार की ओर से उठ रही आवाज केवल बिहार की नहीं है। यह उन लाखों विद्यार्थियों की आवाज है जो अपनी प्रतिभा के दम पर आगे बढ़ना चाहते हैं, लेकिन जिनके लिए अवसरों के द्वार उतनी तेजी से नहीं खुले, जितनी तेजी से देश आगे बढ़ा है। अब निर्णय का समय है। क्योंकि शिक्षा में समान अवसर किसी सरकार की उदारता नहीं, बल्कि लोकतंत्र की अनिवार्य जिम्मेदारी है।
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