
बेगूसराय की धरती ने इतिहासकार प्रो. रामशरण शर्मा, राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ और बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री डा. श्रीकृष्ण सिंह जैसे व्यक्तित्व दिए हैं। इसी बेगूसराय से 19 जुलाई 2026 को बिहार सरकार ने राज्य के 551 सरस्वती विद्या निकेतन (माडल स्कूल) का शुभारंभ किया। यह केवल एक सरकारी कार्यक्रम नहीं, बल्कि सार्वजनिक शिक्षा में बड़े बदलाव का दावा है। इसलिए इसकी सफलता का आकलन उद्घाटन से नहीं, जमीन पर दिखने वाले परिणामों से होगा। सबसे बड़ा सवाल भवन का नहीं, पहुंच का है। माडल स्कूल पूरे प्रखंड के लिए बनाए गए हैं, लेकिन अधिकांश गैर-आवासीय हैं। ऐसे में कई विद्यार्थियों को प्रतिदिन 10 से 30 किलोमीटर तक सफर करना पड़ सकता है। न पर्याप्त छात्रावास हैं और न सुरक्षित परिवहन की स्पष्ट व्यवस्था। यदि योग्य छात्र विद्यालय तक ही नहीं पहुंच पाए, तो समान अवसर का उद्देश्य अधूरा रह जाएगा।
बेगूसराय इसका उदाहरण है। बीपी हाई स्कूल स्थित माडल स्कूल तक वन्द्वार, कोरिया, वासुदेवपुर, कुसमौत और रचियाही जैसे गांवों से रोज आना आसान नहीं है। बरौनी के सिमरिया माडल स्कूल में भी छपकी, सिऊरी, मिर्जापुर, चांद मैदा, बभनगामा, केशावे, मकरदही और सिसवा के कई अभिभावकों ने दूरी और सुरक्षित आवागमन की चिंता के कारण बच्चों का नामांकन नहीं कराया। यदि ऐसी स्थिति अन्य जिलों में भी है, तो यह अपवाद नहीं, बल्कि योजना की संरचनात्मक चुनौती है। माडल स्कूल की अवधारणा तभी सफल होगी, जब पूरे प्रखंड के मेधावी छात्रों को समान अवसर मिले। यदि व्यवस्था केवल आसपास के गांवों तक सीमित रह गई, तो इसका मूल उद्देश्य कमजोर पड़ जाएगा। अवसंरचना भी अहम सवाल है। अधिकतर स्थानों पर पहले से संचालित विद्यालयों को ही माडल स्कूल घोषित किया गया है। यदि प्रयोगशाला, पुस्तकालय, खेल सुविधाएं, डिजिटल संसाधन और शिक्षण वातावरण में स्पष्ट बदलाव नहीं दिखता, तो नया क्या है? किसी विद्यालय की पहचान केवल नए नाम से नहीं, बल्कि उसकी गुणवत्ता से बनती है।
शिक्षक इस पूरी व्यवस्था की धुरी हैं। बेहतर प्रशिक्षण, शैक्षणिक नेतृत्व, जवाबदेही और कार्य-संस्कृति के बिना उत्कृष्ट परिणाम की अपेक्षा यथार्थवादी नहीं होगी।
एक और चुनौती पर ध्यान देना होगा। कई परिसरों में माडल स्कूल और सामान्य विद्यालय साथ-साथ चलेंगे। संसाधनों और अवसरों के वितरण में संतुलन नहीं रहा, तो बच्चों के बीच अनावश्यक मनोवैज्ञानिक दूरी पैदा हो सकती है। विद्यालय समानता का पहला सार्वजनिक मंच होता है। वहां विभाजन की कोई गुंजाइश नहीं होनी चाहिए। संचालन व्यवस्था भी स्पष्ट होनी चाहिए। क्या सभी 551 माडल स्कूलों के लिए समान शैक्षणिक मानक, संचालन पुस्तिका (एसओपी), गुणवत्ता मूल्यांकन प्रणाली और जवाबदेही तय है? यदि है, तो उसे सार्वजनिक किया जाना चाहिए। उत्कृष्टता का दावा तभी भरोसेमंद बनता है, जब उसके मानक भी पारदर्शी हों। मडल स्कूल बिहार की सरकारी शिक्षा को नई दिशा दे सकते हैं, लेकिन इसके लिए सुरक्षित परिवहन, जरूरत आधारित छात्रावास, मजबूत आधारभूत संरचना, प्रशिक्षित शिक्षक और निरंतर गुणवत्ता मूल्यांकन अनिवार्य होंगे।
योजना की असली सफलता उद्घाटन समारोह से नहीं मापी जाएगी। उसका फैसला उस दिन होगा, जब प्रखंड के अंतिम गांव का अभिभावक भी विश्वास के साथ कह सके कि यह विद्यालय उसके बच्चे के लिए भी उतना ही सुलभ, सुरक्षित और गुणवत्तापूर्ण है, जितना किसी शहर के विद्यार्थी के लिए।








