
राष्ट्रीय आय सह मेधा छात्रवृत्ति योजना (एनएमएमएसएस) की शुरुआत 2008 में हुई थी। उद्देश्य था आर्थिक रूप से कमजोर, लेकिन मेधावी विद्यार्थियों को माध्यमिक शिक्षा से जोड़े रखना। तब से देश बदल गया। छात्र संख्या बढ़ी। शिक्षा का दायरा बढ़ा। नई शिक्षा नीति आई। लेकिन इस योजना का ढांचा लगभग जस का तस है। इसका सबसे अधिक खामियाजा बिहार जैसे राज्यों को भुगतना पड़ रहा है। बिहार देश की सबसे युवा आबादी वाला राज्य है। यहां सरकारी विद्यालयों पर निर्भरता अधिक है। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों की संख्या भी राष्ट्रीय औसत से कहीं ज्यादा है। ऐसे राज्य में छात्रवृत्ति के अवसर बढ़ने चाहिए थे, लेकिन तस्वीर उलटी है।
बिहार को हर साल केवल 5,433 छात्रवृत्तियां मिलती हैं। यह राष्ट्रीय कोटे का महज 5.43 प्रतिशत है। जबकि देश की आबादी में बिहार की हिस्सेदारी करीब नौ प्रतिशत है। आबादी के अनुपात से देखें तो राज्य के हिस्से में लगभग नौ हजार छात्रवृत्तियां आनी चाहिए थीं। यानी हजारों मेधावी विद्यार्थियों के लिए अवसर शुरू से ही सीमित कर दिए गए हैं। यू-डायस प्लस के 2024-25 के आंकड़े इस असंतुलन को और उजागर करते हैं। बिहार में कक्षा आठ के 24.16 लाख विद्यार्थी हैं। इसके मुकाबले प्रति 10 हजार विद्यार्थियों पर केवल 22.5 छात्रवृत्तियां उपलब्ध हैं।
अब दूसरे राज्यों पर नजर डालिए। महाराष्ट्र में यह संख्या 83 है। तमिलनाडु में 64। कर्नाटक में 55। गुजरात में 52। ओडिशा में 49 और पश्चिम बंगाल में 43। यानी बिहार का एक मेधावी छात्र महाराष्ट्र के छात्र की तुलना में लगभग चार गुना कम अवसरों के बीच संघर्ष कर रहा है। पश्चिम बंगाल से भी वह आधे अवसरों के साथ प्रतिस्पर्धा कर रहा है। यह सवाल किसी विशेष रियायत का नहीं है। सवाल बराबरी के अवसर का है। आखिर एक ही राष्ट्रीय योजना में अलग-अलग राज्यों के बच्चों के लिए अवसरों का पैमाना अलग क्यों हो? क्या प्रतिभा का मूल्य राज्य की सीमा देखकर तय किया जाएगा?
विडंबना यह है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 समावेशी शिक्षा, समान अवसर और ड्रॉपआउट दर को शून्य के करीब लाने का संकल्प दोहराती है, लेकिन इन लक्ष्यों को सहारा देने वाला सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक आधार पिछले 18 वर्षों से स्थिर पड़ा है। नीति के शब्द आगे बढ़ गए, लेकिन संसाधनों का पहिया वहीं थम गया। दरअसल, यह केवल छात्रवृत्ति का प्रश्न नहीं है। यह संघीय ढांचे में संसाधनों के न्यायपूर्ण वितरण का प्रश्न है। यह उस संवैधानिक भावना का प्रश्न है, जो हर बच्चे को समान अवसर देने की बात करती है। यदि छात्र संख्या, सामाजिक-आर्थिक स्थिति और वास्तविक जरूरतों को नजरअंदाज कर आवंटन तय होगा, तो समान अवसर का सिद्धांत केवल भाषणों और दस्तावेजों में सिमट कर रह जाएगा।
अब समय आ गया है कि राष्ट्रीय आय सह मेधा छात्रवृत्ति योजना की व्यापक समीक्षा हो। राज्यों के कोटे का निर्धारण दो दशक पुराने पैमानों से नहीं, बल्कि वर्तमान जनसंख्या, छात्र संख्या और सामाजिक जरूरतों के आधार पर हो। क्योंकि शिक्षा में असमान अवसर केवल आंकड़ों की समस्या नहीं होते, वे आने वाली पीढ़ियों की संभावनाओं को सीमित करते हैं। और किसी भी लोकतंत्र के लिए इससे बड़ा अन्याय दूसरा नहीं हो सकता।
(नोट:- अंतिम कड़ी कल…)
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