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​​​​​इस पार, उस पार और बीच में खड़ा इतिहास

बेगूसराय के सिमरिया सिक्स लेन पुल के नामकरण और गोलंबर पर प्रतिमा को लेकर छिड़े विवाद के बहाने एक विचारोत्तेजक विश्लेषण।

बेगूसराय में इन दिनों सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि गंगा या गंडक का जलस्तर कितना बढ़ा है। बड़ा सवाल यह है कि गंगा के इस पार बड़ा कौन है और उस पार बड़ा कौन? मुद्दा है गंगा पर तैयार हुआ नया चमचमाता सिक्स लेन पुल और उसके गोलंबर पर सजने वाली मूर्ति। सांसद गिरिराज सिंह ने अपने पत्र के ज़रिए ‘भामाशाह’ का नाम क्या उछाला, जिले में मानो इतिहास, भूगोल और राजनीति तीनों संयुक्त प्रवेश परीक्षा दे रहे हों। अब कोई कह रहा है, “इस पार टप नहीं पाइएगा”, तो कोई कह रहा है, “हमारे रहते यह नहीं होगा।” पुल के नामकरण को लेकर लोग इस कदर मोर्चेबंदी कर चुके हैं, मानो किसी ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ का स्थानीय संस्करण तैयार हो रहा हो।

भामाशाह के नाम पर पुल का नाम रखने की चर्चा चली तो सबसे पहले सवाल उठा—भाई, बेगूसराय का भामाशाह से रिश्ता क्या है? यह ऐसा प्रस्ताव है, जिसे शायद प्रस्ताव रखने वाले भी खुलकर स्वीकार न करें। विरोधी तो छोड़िए, अपनी पार्टी के लोग भी मन ही मन सोच रहे होंगे कि यह तीर कुछ ज्यादा ही दूर निकल गया। पुल से सटे सिमरिया वालों की सुई बस एक ही जगह जाकर अटकी है। उनका कहना है कि पुल का नाम हो तो केवल राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर के नाम पर। दिनकर से कम किसी पर समझौता नहीं। भावना अपनी जगह उचित भी है। आखिर राष्ट्रकवि की जन्मभूमि का अपना स्वाभिमान है। तो अरे भाई! थोड़ा ठहर जाइए, सुस्ता लीजिए। पुल कोई एक्सप्रेस ट्रेन तो है नहीं कि बिना नाम के भागा जा रहा है और न ही चौराहा कहीं खिसकने वाला है। संतोष नाम की भी कोई चीज होती है! दिनकर जी राष्ट्रकवि थे, हैं और रहेंगे। देश के कोने-कोने में उनके नाम का डंका बजता है। उनके सम्मान पर किसी को आपत्ति नहीं हो सकती। सरकार की मेहरबानी रही तो आज नहीं तो कल एक ‘रामधारी सिंह दिनकर विश्वविद्यालय’ भी आपके हिस्से आ ही जाएगा। जरा नजर उठाकर देखिए कि जिले में दिनकर जी के नाम पर क्या-क्या नहीं है? फिर एक नए गोलंबर के लिए इतनी हाय-तौबा क्यों मची है? जबकि नए गोलबंर से कमोबेश तीन-चार किलोमीटर उत्तर की तरफ बढ़ जाएं तो ‘दिनकर’ की तरह ही राष्ट्रकवि आदमकद के रूप में विराजमान हैं।

अब नए वाले गोलंबर से उत्तर की तरफ बढ़ते हैं। थर्मल, रिफाइनरी और फर्टिलाइजर नजर आता है। आपके जिले में यह देन डा. श्रीकृष्ण सिंह की है। बिहार आज जिस विकास की सड़क पर दौड़ रहा है, उसकी असली नींव उन्हीं ने रखी थी। इन कारखानों में पीली टोपी पहनकर ड्यूटी बजाने वाले ज्यादातर लोग उसी ‘इस पार’ वाले इलाके से आते हैं। जिसने आपके हाथों में रोजी-रोटी दी, उसे आप इतना कम आंक रहे हैं कि दिनकर जी के सामने वे कुछ भी नहीं? हालांकि, श्रीकृष्ण बाबू के नाम पर भी देशभर में संस्थाएं, चेयर, सड़कें और भवन पटे पड़े हैं, इसलिए वहां भी आपको थोड़ा सब्र तो करना ही पड़ेगा।

लेकिन, इस पूरी ‘नामकरण-लीला’ में जो सबसे बड़ा व्यंग्य है, वह जिले के ही विश्वविख्यात सपूत प्रो. रामशरण शर्मा और प्रख्यात व्याकरणाचार्य डॉ. वचन देव कुमार के साथ हो रहा है। प्रो. रामशरण शर्मा ने ऐसी किताबें लिखीं, जिन्हें पढ़कर दुनिया भर के विश्वविद्यालयों में भारतीय इतिहास समझा जाता है। उनके शोध पर पीढ़ियां तैयार हुईं। उनकी किताबें पढ़कर देश-दुनिया के युवा अपना नया भविष्य रच और गढ़ रहे हैं। वहीं डॉ. वचन देव कुमार हिंदी के प्रसिद्ध व्याकरणाचार्य थे। भाषा और व्याकरण के क्षेत्र में उनका योगदान आज भी विद्यार्थियों, शोधार्थियों और शिक्षकों के लिए मार्गदर्शक है। उनकी पुस्तकों ने लाखों विद्यार्थियों को हिंदी व्याकरण की बारीकियां समझाईं, लेकिन विडंबना देखिए कि जिस बेगूसराय ने इन दोनों विद्वानों को जन्म दिया, वहीं उनके नाम पर कोई बड़ा सरकारी संस्थान नहीं है। प्रो. शर्मा जैसे बड़े विद्वान और इतिहासकार की पूरे बिहार में एक अदद मूर्ति तक नहीं है। कोई विश्वविद्यालय नहीं, कोई प्रमुख भवन नहीं, कोई शोध संस्थान नहीं। अचरज यह है कि आज तक किसी ने यह मांग भी नहीं उठाई कि जिले के सबसे बड़े कॉलेज का कोई भवन ही उनके नाम पर हो जाए। किसी विश्वविद्यालय का नाम उन पर रखा जाए। किसी पुस्तकालय के बाहर उनकी प्रतिमा लगे। जरा ठंडे दिमाग से सोचिए, अगर यह नया सिक्स लेन सेतु प्रो. रामशरण शर्मा या डा. वचनदेव कुमार के नाम हो जाए और गोलंबर पर उनकी प्रतिमा लग जाए, तो क्या आपकी शान घट जाएगी? या दिनकर जी स्वर्ग से आपको कोई श्राप दे देंगे? या फिर इतिहास खुद आकर आपत्ति दर्ज कराएगा?

बेगूसराय की सबसे बड़ी ताकत यह है कि उसने एक नहीं, अनेक विभूतियां देश को दी हैं। दुर्भाग्य यह है कि हम उनके सम्मान को भी “इस पार” और “उस पार” में बांटने पर तुले हैं। पुल का काम लोगों को जोड़ना होता है। यदि उसके नाम पर भी समाज बंटने लगे, तो समझ लीजिए कि गंगा के दोनों किनारों के बीच पानी नहीं, हमारी सोच बह रही है।

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शेखर

पत्रकारिता ही की है अब तक।
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Ranjan Kumar
Ranjan Kumar
3 days ago

सरजमीं ए बेगूसराय की मिट्टी से जुड़ी हो कीर्ति जिसकी
मूर्ति लगे उसीकी ।

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